Sunday, October 2, 2011

वृक्ष का सम्मान

गौतम बुद्ध एक दिन एक वृक्ष को नमन कर रहे थे। उनके एक शिष्य ने यह देखा तो उसे हैरानी हुई। वह बुद्ध से बोला, 'भगवन, आपने इस वृक्ष को नमन क्यों किया?' शिष्य की बात पर बुद्ध बोले, 'क्या इस वृक्ष को नमस्कार करने से कुछ अनहोनी घट गई?' शिष्य बुद्ध का जवाब सुनकर बोला, 'नहीं भगवन! ऐसी बात नहीं है, किंतु मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि आप जैसा महान व्यक्ति इस वृक्ष को नमस्कार क्यों कर रहा है? यह न तो आपकी बात का जवाब दे सकता है और न ही आपके नमन करने पर प्रसन्नता व्यक्त कर सकता है।'

शिष्य की बात पर बुद्ध ने कहा, 'भंते, तुम्हारा सोचना गलत है। वृक्ष मुझे जवाब बोल कर भले ही न दे सकता हो किंतु जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की एक भाषा होती है, उसी प्रकार प्रकृति और वृक्षों की भी एक अलग भाषा होती है। अपना सम्मान होने पर वे झूम कर प्रसन्नता और कृतज्ञता दोनों ही व्यक्त करते हैं। इस वृक्ष के नीचे बैठकर मैंने साधना की, इसकी पत्तियों ने मुझे शीतलता प्रदान की, धूप से मेरा बचाव किया।

हर पल इस वृक्ष ने मेरी सुरक्षा की। इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मेरा कर्त्तव्य है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सदैव कृतज्ञ बने रहना चाहिए क्योंकि प्रकृति व्यक्ति को सुंदर व सुघड़ जीवन प्रदान करती है। तुम जरा इस वृक्ष की ओर देखो कि इसने मेरी कृतज्ञता व धन्यवाद को बहुत ही खूबसूरती से ग्रहण किया है और जवाब में मुझे झूम कर यह बता रहा है कि आगे भी वह प्रत्येक व्यक्ति की हरसंभव सेवा करता रहेगा।' बुद्ध की बात पर शिष्य ने वृक्ष को देखा तो उसे लगा कि सचमुच वृक्ष एक अलग ही मस्ती में झूम रहा था और उसकी झूमती हुए पत्तियां, शाखाएं व फूल मन को एक अद्भुत शांति प्रदान कर रहे थे। यह देखकर शिष्य स्वत: वृक्ष के सम्मान में झुक गया।
संकलन: रेनू सैनी 

इतिहास बनती जा रही है गौरैया

रमेश सिंह 
गौरैया अब कम दिखती है। सर्वत्र परिचित, सर्वव्यापी चहचहाने वाली फुर्तीली और चहलकदमी करने वाली गौरैया को हमेशा सर्दी की फसलों के दौरान, खेत-खलिहानों में अनेक छोटे-छोटे पक्षियों के साथ फु दकते देखा जाता है। छोटी होते हुए भी यह चिड़ियां लंबी उड़ान भरती है। गौरैया पूरे विश्व में तेजी से दुर्लभ पक्षियों में शामिल होती जा रही है।

भारत के, हिंदी भाषी क्षेत्रों में यह पक्षी गौरैया के नाम से लोकप्रिय है जबकि गुजरात में इसे चकली, मराठी में चिमानी, पंजाब में चिड़ी, जम्मू तथा कश्मीर में चेर, तमिलनाडु तथा केरल में कूरूवी, तेलगू में पिच्चूका, कन्नड़ में गुब्बाच्ची, पश्चिम बंगाल में चराई पाखी, तथा ओडि़शा में घरचटिया कहते हैं। उर्दू में इसे चिड़ियां तथा सिंधी में झिरकी कहा जाता है।

बीएनएचएस सर्वेक्षण जांच के आधार पर गौरैया की संख्या 2005 तक 97 प्रतिशत तक घट चुकी है। बढ़ता शहरीकरण, खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग, बढ़ता हुआ प्रदूषण और बड़े स्तर पर गौरैया को मारना जैसे कई कारक हैं जिनसे यह पक्षी आज लुप्त होने की कगार पर हैं। इसके विभिन्न कारण हैं। सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग, जिसके जलने पर मिथाइल नाइट्रेट नामक यौगिक तैयार होता है- यह यौगिक छोटे जंतुओं के लिए काफी जहरीला है। खर-पतवार की कमी और गौरैया को खुला आमंत्रण देने वाले ऐसे खुले भवनों की कमी हो गई है जहां वह अपने घोंसले बनाया करती थी। खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा इसके भोज्य-पदार्थों की उपलब्धता में कमी प्रमुख कारक हैं जो इनकी घटती आबादी के लिए जिम्मेवार हैं। जीवनशैली तथा इमारतों के आधुनिक रूप से आए परिवर्तन ने पक्षियों के आवासों तथा खाद्य स्त्रोतों को बर्बाद कर दिया है। खत्म होते बगीचे भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

विज्ञान और पर्यावरण केंद्र का कहना है कि कृषि में कीटनाशक दवाओं का अधिक इस्तेमाल और डीडीटी, आल्ड्रिन तथा डिआल्ड्रिन गौरैया की मौत के प्रमुख कारण हैं। खाद्य कड़ी में इन रसायनों का संचय गौरैया की प्रजनक प्रणाली को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।

गौरैया फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को समाप्त करने में सहायक होती है। यह एक बुद्धिमान चिड़िया है, जिसने घोंसला स्थल, भोजन तथा आश्रय परिस्थितियों में अपने को उनके अनुकूल बनाया है इन्हीं विशेषताओं के कारण विश्व में सबसे ज्यादा पाई जाने वाली चहचहाती चिड़िया बन गयी। बसंत के मौसम में, फूलों की क्रोकूसेस, प्राइमरोजेस तथा एकोनाइट्ज फूलों की प्रजातियां घरेलू गौरैया को ज्यादा आकर्षित करती हैं।

डॉ. सालिम अली ने अपनी पुस्तक इंडियन बर्ड्स में गौरैया का वर्णन भगवान की निजी भस्मक मशीन के रूप में किया है जिसकी जगह मानव के आविष्कार से बनी कृत्रिम मशीन कभी नहीं ले सकती है। गौरैया का प्रमुख आहार जमीन में बिखरे दाने हैं। अगर अनाज उपलब्ध न हो तो यह कीटों को भी खा लेती है। यह घरों से बाहर फेंके गए कूड़े करकट में भी अपना आहार ढूंढ लेती है।

इनके घोंसले भवनों की सूराखों या चट्टानों में, घर या नदी के किनारे, समुद्र तट या झाड़ियों में, आलों या प्रवेश द्वारों जैसे विभिन्न स्थानों पर होते हैं। ये घोंसले घास के तिनकों से बने होते हैं और इनमें पंख भरे होते हैं। इनके अंडे अलग-अलग आकार और पहचान के होते हैं। अंडे को मादा गौरैया सेती है। गौरैया की अंडा सेने की अवधि 10-12 दिनों की होती है जो सभी चिड़ियों की अंडे सेने की वधि में सबसे छोटी है। इसकी प्रजनन सफ लता उम्र के साथ बढ़ती है और यह प्रजनन समय में परिवर्तन लाती है। बड़ी चिड़िया ऋतु से पहले अंडा देती है।

पौराणिक कथाओं में गौरैया की तुलना युगल प्रेमियों से की जाती है क्योंकि ये पक्षी सदा जोड़े में दिखाई देती हैं, मानो स्नेह की डोर में बंधे हुए हों। इन पक्षियों का आकार और आकाश में उड़ने की उनकी क्षमता जैसी उनकी विशेषताएं ही उन्हें जोड़ा बनाने, प्रेम के सूत्र में बंधने, एक दूसरे को सुरक्षा और प्यार देने में सहायक होते हैं।

सरकार ने अप्रैल, 2006 में भारत में पक्षी संरक्षण के लिए एक कार्य योजना की घोषणा की थी। चरणबद्ध ढंग से डाइक्लोफेनेक का पशुचिकित्सीय इस्तेमाल पर रोक तथा बर्ड्स के संरक्षण और प्रजनन केन्द्र की भी घोषणा की थी पर नतीजा कुछ खास नहीं निकला। शहर में भी आप अपने आसपास देखेंगे तो आपको गौरैया नजर आ जाएंगी। हर रोज कुछ दाने चावल के अपनी छत या बालकनी पर बिखेर दीजिए। आप पाएंगे कि रोज सुबह आपके घर उनका आना शुरू हो जाएगा। आपके लगाव को गौरैया बड़ी जल्दी पहचान लेती है। हम चाहे तो गौरैया जैसी प्यारी चिड़िया को आसानी से बचा सकते हैं।