पुणे
, यरवदा निवास , २० फरवरी १९४४ को कस्तूरबा गांधी अपनी चटाई पर गठरी बनी
पड़ी थी । उनकी आँखे बुखार से जल रही थी । उन्होंने साँस लेने कि कोशिश कि ।
रह रहकर खांसी उनके सारे बदन को झकझोर देती थी और वे थककर हाँफने लगती
थी । बगल में घुटनो पर बैठे हुए महात्मा गाँधी उनके सूखे होंठो को गीले
कपडे से पोंछ रहे थे । तभी हाथ में बैग लिए एक अंग्रेज डाक्टर कमरे में
दाखिल हुआ । ओह ! सर आप आ गए । गांधी अधीर से होते हुए चिल्लाए ' इनकी
तबियत बहुत ख़राब है , देखिये इनका दम घुट रहा है। ' डाक्टर ने देखा बिना
कुछ बोले गंभीर मुद्रा से अपना बैग खोलकर एक सिरिंज और शीशी निकाली । ' ये
क्या है ? गांधी ने पूछा ।
'सिर्फ पेन्सिलिन , मिस्टर गांधी । परेशान न हो दो या तीन शीशी बस और हम इन्हे ठीक कर लेंगे ।'
डाक्टर ने अपनी सिरिंज कि तरफ देख कर कहा कि उन्हें सुई का चुभना पता भी नहीं लगेगा ।'
'सवाल यह नहीं है ,' गांधी ने जबाव दिया । ' मैं इंजेक्शन लगाकर इलाज करने के एकदम खिलाफ हू , यह प्राकृतिक नहीं है और मानवता के हितकर नहीं है ।'
क्या ? डाक्टर चिल्लाया ,'आप इंजेक्शन के लिए मना नहीं करेगे , क्या आप
ऐसा करेगे ? ' महात्मा ने बिना विचलित हुए उनकी तरफ देखा । डाक्टर ने अपना
सिर झुका दिया ।
गांधी उठे और रात के अँधियारे में डाक्टर के पीछे
बाहर चले आये । ' मेरे लिए आपको आगाह करना जरुरी है मिस्टर गांधी ,
पेन्सिलीन के बिना वे नहीं बचेगी । ' ' ये फैसला ईश्वर करेगा , सर ! न आप
और देवदास , ' गांधी ने चुपके से जबाव दिया ।
'मिस्टर गांधी ,
समझदारी से काम लीजिये , आपकी पत्नी नहीं बचेंगी । अगर ऐसा होता है , तब
उनका समय आ गया है । ' महात्मा गांधी ने सख्ती से कहा । 'यह बेतुकी बात है ।
' डाक्टर ने कमरे कि तरफ बढ़ते हुए जोर से कहा । दोनों कस्तूरबा के पास
जाते है और कुछ देर बाद उनकी आँखे बंद हो गई ।