Wednesday, October 13, 2010

जैसे जैसे हम बाहय रूपों की विविधता मैं उलझते जाते है , वैसे वैसे उनके मूलगत जीवन को भूलते जाते है|
इस समय विश्राम की बात तुम कैसे कर सकते हो ? जब हम लोग शरीर त्यागेगे , तभी विश्राम करेगे |
विवेकी पुरुष को अपने मन मैं यह विचार करना चाहिए की मैं कहाँ हू , कहाँ जाऊंगा , मैं कोन हू, यहाँ किसलिए आया हू और किसलिए किसका शोक करू |

Thursday, October 7, 2010

स्वाथ्र की अनुकूलता और प्रतिकूलता से ही मित्र और शत्रु बना करते है|

Tuesday, October 5, 2010

(title unknown)

(title unknown): "बारिश का परिणाम शरीर पर और उसके दोवारा मन पर होता है तो प्राथर्ना का परिणाम ह्रदय के दोवारा आत्मा पर होता है |
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बारिश का परिणाम शरीर पर और उसके दोवारा मन पर होता है तो प्राथर्ना का परिणाम ह्रदय के दोवारा आत्मा पर होता है |

Saturday, October 2, 2010

जैसे बीज अपना अस्तित्व मिटा कर वृक्ष बन कर एक से अनेक हो जाता है, उसी प्रकार वह प्राणी जो सब प्राणियों के हित में अपने को मिटा देता है तो वह अनंत शक्ति सम्पन्न हो जाता है|
(स्वामी भजनानंद)
वैभव अपने ध्येय तक पहुंचने के प्रयास में है, न की उस तक पहुंचने में (गाँधी )
धन के लोभी को सचाई नहीं होती और व्यभिचार करने वाले को पवित्रता नहीं होती
जिसके हजार दोस्त है, उसे मोके पर कोई दोस्त नहीं मिलता, और जिसका एक दुश्मन है उसे वह हर जगह मिल जाता है |