Thursday, December 13, 2012

अमेरिका की एक चर्चित खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि संगठित इस्लामी आतंकवाद अब विदा होने की राह पर है और अब से 18 साल बाद यह बीते जमाने की बात हो चुका होगा। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि अमेरिका की कौन सी रणनीति उसे यह खुशी मनाने का मौका देगी।

दरअसल 120 पृष्ठों की इस लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में अमेरिका की किसी रणनीति के बारे में बात ही नहीं की गई है। 'ग्लोबल ट्रेंड्स-2030' शीर्षक से जारी यह रिप
ोर्ट एक परंपरा का हिस्सा है, जिसके तहत राष्ट्रपति चुनाव के तुरंत बाद, यानी हर चार साल पर अमेरिका की खुफिया संस्थाएं दुनिया का हालचाल लेती हुई एक साझा रिपोर्ट जारी करती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक एक प्रवृत्ति के रूप में इस्लामी आतंकवाद 2030 के बाद भी बना रह सकता है, लेकिन अल कायदा की शक्ल में उसका संगठित रूप आने वाले दिनों में वैसे ही समाप्त हो जाएगा, जैसे उससे पहले के आतंकी संगठन समाप्त हुए हैं। अमेरिकी खुफिया बौद्धिकों का मानना है कि ऐसे संगठन तीस साल के होते-होते अपने जनाधार, काडर बेस और समर्थक ताकतों के लिए नुकसानदेह साबित होने लगते हैं। बाद में ये तनाव इनकी टूट-फूट, आपसी टकराव और बिखराव के रूप में जाहिर होते हैं।रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक आतंकवाद जड़ से खत्म भले न हो लेकिन उसका रूप निश्चित तौर पर बदल जाएगा। आतंकवादी तत्व उस समय 9/11 जैसे हमले नहीं कर पाएंगे, लेकिन बेहतर टेक्नोलॉजी तक अपनी पहुंच के बल पर वे दुनिया को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाने की हालत में होंगे। कम विकास दर, महंगाई, बेरोजगारी, असमानता और ऊर्जा संसाधनों की किल्लत को आने वाले दिनों में आतंकवाद के ज्यादा गहरे कारणों के रूप में चिह्नित किया गया है।
इन समस्याओं का प्रकोप पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अधिक गहरा होगा, लिहाजा अफ-पाक इलाका आगे भी आतंकवाद से जुड़ी खबरों में बना रहेगा। खासकर पाकिस्तान के बारे में रिपोर्ट का मानना है कि यहां की आबादी में नौजवानों की बहुत बड़ी तादाद, इस देश की स्थिरता के खिलाफ जा रही है और इसके 'फेल्ड स्टेट' बनने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है।

इसके विपरीत बांग्लादेश बिल्कुल इस खतरे के मुंह में जाकर पिछले चार सालों में इससे बाहर निकल आया है। यह सकारात्मक उदाहरण बताता है कि इस्लामी देशों में अगर लोकतंत्र को जड़ पकड़ने का मौका मिले और वहां आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने वाले उपाय किए जाएं तो न सिर्फ उन्हें अस्थिर होने से बचाया जा सकता है, बल्कि वहां कुंडली मारे आतंकवादी संगठनों को भी बेदम किया जा सकता है।

रिपोर्ट में ग्लोबल इस्लामी आतंकवाद से जुड़े सबसे भावनात्मक मुद्दे फलस्तीन की बात भी की गई है। बताया गया है कि अगर फलस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र बनने का मौका दिया जाता है, तो यह विश्व शांति के लिए अच्छा रहेगा। लेकिन अफसोस की बात है कि इस दिशा में कुछ करने के बजाय अमेरिका ने इसके लिए हाल में संयुक्त राष्ट्र के मंच पर की गई ऐतिहासिक पहल के प्रति भरपूर कड़वाहट जताई है।

Wednesday, December 12, 2012

 भारत में अपने स्टोर खोलने को बेकरार ग्लोबल रीटेल कंपनी वॉलमार्ट अमेरिकी सांसदों के बीच अपनी पैरवी (लॉबीइंग) पर 2008 से अब तक 25 मिलियन डॉलर (करीब 125 करोड़ रुपये) खर्च कर चुकी है। इसमें भारत में आने की मंजूरी देने के लिए लॉबीइंग पर खर्च भी शामिल है। वॉलमार्ट की ओर से अमेरिकी सेनेट में दाखिल डिस्क्लोजर रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। उधर, सीनियर बीजेपी लीडर मुरली मनोहर जोशी ने कहा है कि अगले चुनावों में एनडीए की सरकार आने पर एफडीआई का फैसला रद्द कर दिया जाएगा।

वॉलमार्ट ने अमेरिकी सीनेट को सौंपे अपने लॉबीइंग संबंधी दस्तावेज में बताया कि 2012 में 30 सितंबर तक कंपनी ने भारत में एफडीआई सहित विभिन्न मसलों पर विचार-विमर्श के लिए 18 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इनमें से 10 करोड़ रुपये (16.5 लाख डॉलर) सिर्फ जुलाई-सितंबर तिमाही में ही खर्च किए गए हैं। इसी तिमाही में (14 सितंबर को) भारत सरकार ने मल्टि-ब्रैंड रिटेल में 51% एफडीआई को मंजूरी दी थी।

वॉलमार्ट ने अमेरिकी सीनेट, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव, यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (यूएसटीआर) और अमेरिकी विदेश विभाग में अपना पक्ष रखने के लिए लॉबीइंग की। अमेरिका में कंपनियों को विभिन्न विभागों और एजेंसियों में अपना पक्ष रखने के लिए लॉबीइंग करने की इजाजत है। हालांकि, उन्हें हर तिमाही में अमेरिकी सीनेट को अपनी लॉबीइंग गतिविधियों की जानकारी देनी होती है। वॉलमार्ट का कहना है कि वर्ष 2009 की कुछ तिमाहियों को छोड़कर वह वर्ष 2008 के बाद से भारत आने को लेकर लगातार लॉबीइंग कर रही है।दुनियाभर में वॉलमार्ट का सालाना कारोबार 444 अरब डॉलर का है और इसके कर्मचारियों की संख्या 22 लाख है। भारत आने का रास्ता साफ होने के साथ ही कंपनी ने यहां के बाजार में उतरने की तैयारी शुरू कर दी है। भारत का रीटेल बाजार करीब 500 अरब डॉलर का है। वर्ष 2020 तक इसके 1000 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है।
हमारे संविधान में 1969 के Act की धारा "49-O" में एक प्रावधान है, जिसके अनुसार एक व्यक्ति मतदान बूथ पर जाकर अपनी पहचान की पुष्टि तथा अपनी उंगली चिह्नित करने के बाद पीठासीन अधिकारी को बता सकता है कि वह किसी भी candidate को वोट नहीं देना चाहता है. ऐसी सुविधा उपलब्ध है, लेकिन इस सुविधा को इन चतुर चालाक नेताओं ने कभी भी नहीं बताया है. इसे "49-O" कहा जाता है. हमें क्यों ये कहना चाहिये कि मैं किसी को भी 
वोट नहीं देना चाहता हूँ? क्योंकि, एक वार्ड में, अगर एक उम्मीदवार 100 मतों से जीतता है, और उस वार्ड को 49-O वोट इन 100 मतों से अधिक मिलते हैं, तो, मतदान रद्दकर दिया जायेगा और दोबारा मतदान होगा. इतना ही नहीं, उन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी को समाप्त कर दिया जायेगा और वे फिर से चुनाव नहीं लड़ सकते क्योंकि लोगों ने पहले ही उन पर अपना निर्णय व्यक्त कर दिया है.यह बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि निर्वाचन आयोग ने अभी तक इस सुविधा को सार्वजनिक नहीं किया है.
प्रमोशन में आरक्षण वाले बिल पर समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के रवैये से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ये पार्टियां एफडीआई पर सरकार को दिए अपने समर्थन की कीमत वसूलना चाहती हैं? आम राय यह बन रही है कि इन दलों ने सरकार को संभलने तक का मौका नहीं दिया और तत्काल सौदेबाजी पर उतारू हो गईं।
प्रमोशन में आरक्षण बिल को लेकर इन दोनों पार्टियों का स्टैंड पहले से ही स्पष्ट रहा
 है। बीएसपी इसके पक्ष में है, जबकि एसपी इसका विरोध कर रही है। जब सरकार ने इसे राज्यसभा में पेश करने का निर्णय किया तो ये दोनों दल अपने-अपने स्टैंड के साथ सामने आ गए हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। जब सदन चल रहा होगा तो एक साथ कई मसले उठेंगे ही और इस पर वैचारिक टकराव भी होगा। जनतंत्र के लिए यह स्वाभाविक है। लोकतंत्र का अर्थ ही है असहमति के बीच सहमति के कुछ बिंदुओं की तलाश।
हो सकता है कि दो दलों के बीच दस मामलों में मतभेद हों, लेकिन अगर किसी एक पर उनमें सहमति है तो वे उस एक मामले को लेकर साथ चल सकते हैं। जब दूसरे मुद्दे की बारी आएगी तो उनके रास्ते अलग हो जाएंगे। अभी हाल तक यह कौन सोचता था कि कभी लेफ्ट पार्टियां और बीजेपी भी करप्शन या एफडीआई के सवाल पर साझा स्टैंड लेंगी? ज्यादा दिन नहीं हुए जब उनके नेता एक-दूसरे को अछूत की तरह देखते थे। सहमति के न्यूनतम तत्वों के आधार पर साझा कार्यक्रम चलाने की रणनीति एक मैच्योर होती डेमोक्रेसी का लक्षण है।इसलिए यह बिल्कुल संभव है कि एफडीआई के सवाल पर सरकार की जान बचाने वाली बीएसपी, प्रमोशन में आरक्षण के सवाल पर उसे कठघरे में खड़ा कर दे। यही बात एसपी पर भी लागू होती है। ये दोनों पार्टियां एफडीआई पर समान निर्णय ले सकती हैं, मगर प्रमोशन में आरक्षण पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं। वैसे, जनतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी निष्कर्ष अंतिम नहीं होता। समय के साथ पार्टियां अपना स्टैंड भी बदलती हैं। लेकिन किसी परिपक्व जनतंत्र का एक गुण यह भी है कि उसमें पार्टियां सिस्टम का सम्मान करती हैं और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को समझती हैं।
चाहे वह एसपी हो या बीएसपी या बीजेपी, सबको संसदीय कार्यवाही का सम्मान अवश्य करना चाहिए। अपनी बात रखने के लिए कार्यवाही को ठप करना कोई रास्ता नहीं है। अपनी मांगें वे निर्धारित तरीके से ही रखें। संसद के जरिए ही उनका पक्ष सामने आना चाहिए। इसके बाहर की गतिविधियों से भ्रम ज्यादा फैलता है। फिर मतभेद रखने का अर्थ यह भी नहीं कि एसपी और बीएसपी एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाएं। लेकिन इस स्थिति में यह सरकार की जवाबदेही है कि वह प्रमोशन में आरक्षण के सवाल पर सब को सुनने का धैर्य दिखाए और एक आम सहमति बनाने की कोशिश करे।