Friday, September 30, 2011

सरकारी खर्चों को सार्वजनिक और निजी सुविधाओं में बांटा जाए


भरत झुनझुनवाला॥ 
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सीरंगराजन ने कहा है कि सरकारी खर्चों के ' प्लान ' एवं 'नॉन - प्लान ' के वर्गीकरण को समाप्त किया जाये। कईप्लान अथवा पूंजी खर्च अनुत्पादक होते हैं जैसे बीमारसार्वजनिक इकाइयों की इक्विटी में निवेश करना अथवाडाक्टरों के अभाव के बावजूद प्राइमरी हेल्थ सेंटर बनाना।दूसरी ओर कई नॉन - प्लान अथवा राजस्व खर्च उत्पादकहोते हैं जैसे पुलिस द्वारा कानून व्यवस्था ठीक होने सेविकास स्वयं हो जाता है। आयोग चाहता है कि ' प्लान 'एवं ' नॉन - प्लान ' के कृत्रिम विभाजन को समाप्त करदिया जाये लेकिन पूंजी एवं राजस्व खर्च के विभाजन कोबनाए रखा जाये। 

भारी - भरकम सरकार 
आयोग की सोच की मूल दिशा सही है किंतु पूंजी एवं राजस्व खर्च के विभाजन को बनाए रखने से मूल विसंगतिबनी रहेगी। प्रतीत होता है कि आयोग का अनकहा उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को पोषित करने की पालिसी परआधा - अधूरा पर्दा डालना है। भारत सरकार का जनहित हासिल करने का पुराना नुस्खा है - हर काम के लिएसरकारी नौकरों की फौज बनाओ। इससे सरकार का आकार बड़ा होता जाएगा और जनता पर शासन करनाआसान होगा। पचास के दशक में यह कार्य कम्युनिटी डिवेलपमेंट के झंडे तले हुआ। अस्सी के दशक में इंदिरागांधी ने गरीबी हटाओ के नाम पर अनेक योजनायें शुरू की। अब शिक्षा , स्वास्थ्य एवं रोजगार गारंटी के नाम परसरकारी कर्मचारियों को पोषित किया जा रहा है। 

रोजगार के बदले राहत 
इन मदों से जनता को लाभ होना संदिग्ध है किंतु सरकारी कर्मचारियों को लाभ होना निश्चित है। निजी टीचरोंकी तुलना में सरकारी अध्यापक चार गुना वेतन पाते हैं और उनका आधा रिजल्ट देते हैं। सरकारी अस्पतालों मेंमरीज अपने पैसों से दवा खरीद कर लाते हैं और उनके लिये सप्लाई की गयी दवाएं ब्लैक की जाती हैं। रोजगारगारंटी योजना के अंतर्गत प्रधानों द्वारा 30 से 50 फीसदी कमीशन सरकारी अधिकारियों को दिया जा रहा है। इसकार्यक्रम के माध्यम से सरकार जनता को मुफ्तखोर और अपंग बना रही है। जनता भ्रम में रहती है कि उसके बच्चेको मुफ्त शिक्षा मिल रही है जबकि बच्चे को घटिया शिक्षा देकर आजीवन गरीब बनाये रखा जाता है। 

गांधीजी ने कहा था कि नंगे को कपड़े नहीं स्वरोजगार दीजिये। परंतु कल्याणकारी कर्मचारियों के सरदारों को यहनागवार लगता है। यह दुराग्रह चलता रहे और इन खर्चों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहे इसलिये अब ' नॉन - प्लान 'के वर्गीकरण को समाप्त किया जा रहा है। इन खर्चों की राजस्व में गिनती होती रहेगी परंतु एक कांटा निकलजाएगा। मेरा तर्क यह नहीं है कि प्लान एवं नॉन - प्लान के वर्गीकरण को बनाये रखा जाये। यह वर्गीकरण सही मेंअप्रासंगिक है। परंतु खर्चों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जाना चाहिये कि सच्चे और झूठे खर्चों का स्पष्ट भेद होजाये। जरूरत इस बात की है कि सरकारी कर्मचारियों को पोसने के स्थान पर जनता को पोसा जाये। 

एनडीए के कार्यकाल में विजय केलकर की अध्यक्षता में वित्तीय घाटा नियंत्रित करने के संबंध में एक कमिटीबनायी गयी थी। उसका सुझाव था कि सरकारी खर्चों को प्लान एवं नॉन - प्लान के स्थान पर सार्वजनिक एवंनिजी सेवाओं में वर्गीकृत किया जाना चाहिये। सार्वजनिक सेवायें वे हैं जिन्हें व्यक्ति बाजार से नहीं खरीद सकताऔर जिन्हें केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है जैसे - नहर , सड़क , टेलीफोन , बिजली , कानून , न्याय ,रक्षा , मुद्रा , मलेरिया का छिड़काव , शिक्षा के लिये पाठ्यक्रम तय करना , परीक्षा लेना , प्रमाणपत्र जारी करनाइत्यादि। इस प्रकार की सार्वजनिक सुविधाओं पर सरकारी खर्च का सुप्रभाव प्रमाणित है। उदाहरण के लिये श्री केएन रेड्डी ने नब्बे के दशक में एक अध्ययन में पाया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सरकारी अस्पतालों में उपचारपर किये गये खर्च की तुलना में जन शिक्षा , रिसर्च , लैबोरेटरी और संक्रामक रोगों से बचाव इत्यादि पर कियेगये खर्च से जन स्वास्थ्य में कहीं ज्यादा लाभ हुआ है। 

योजना आयोग द्वारा प्लान - नॉन प्लान खर्चों के वर्गीकरण को समाप्त करने की पहल सही दिशा में है। परंतु इसेसमाप्त करके सरकारी खर्चों को पूंजी एवं राजस्व खर्च के उतने ही अप्रासंगिक वर्गों में नहीं बांटना चाहिये। इसकेबजाय खर्चों को केलकर के सुझाव के अनुरूप ' सार्वजनिक सुविधाओं ' और ' निजी सुविधाओं ' के वर्गों में बांटनाचाहिये। सरकार की पहली जिम्मेदारी उन सुविधाओं को सुचारु रूप से उपलब्ध कराना है , जिन्हें जनता स्वयंहासिल नहीं कर सकती है। हमें प्रतिदिन बताया जा रहा है कि बुनियादी संरचना में अमुक हजार करोड़ रुपयेनिवेश की जरूरत है। यदि सरकार इस निवेश को अंजाम दे तो रोजगार स्वयं ही उत्पन्न हो जायेंगे। कानून -व्यवस्था सही होने से बिहार के लोगों ने जमीन परती छोड़ने के स्थान पर सब्जी इत्यादि उगाना शुरू कर दियाहै। यही बात गांधीजी ने कही थी। परंतु कल्याणकारी माफिया के सरदारों को यह नुस्खा पसंद नहीं आता है। यदिमलेरिया के लिये तालाब पर छिड़काव हो गया तो ग्रामीणों का स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा। ऐसा हुआ तो सरकारीडॉक्टरों की नियुक्ति का आधार ही नहीं रह जायेगा। यदि परीक्षा व्यवस्था ठीक हो गयी तो न पढ़ाने वाले सरकारीटीचरों का भंडाफोड़ हो जायेगा। 

कुनबे का हित 
सी रंगराजन , मनमोहन सिंह और मोंटेक अहलूवालिया सभी मूल रूप से सरकारी नौकर रहे हैं। अपने कुनबे काहित उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस दुराग्रह को पूरा करने के लिये नुस्खा यह निकाला गया है कि तालाब परछिड़काव एवं परीक्षा में सुधार कम करो और सरकारी डॉक्टरों एवं टीचरों की नियुक्ति अधिक करो। इसीलियेकहा जा रहा है कि प्लान - नॉन प्लान का वर्गीकरण समाप्त कर दो। गांव में सड़क और सिंचाई कमजोर बनायेरखो , जिससे ग्रामीण स्व - रोजगार न कर सकें। फिर उनकी गरीबी दूर करने के लिये सरकारी शिक्षकों औरस्वास्थ्य कर्मियों की फौज खड़ी कर लो और रोजगार गारंटी योजना में कमीशन वसूलने का रास्ता खोल दो।

भारत में बफेट टैक्स

बफेट टैक्स की चर्चा बरास्ता गृह मंत्री पी. चिदंबरम यहां भी आ पहुंची है। वारेन बफेट अमेरिकी हैं और दुनिया के सबसे अमीर पूंजीपतियों में शुमार किए जाते हैं। पिछले दिनों उन्होंने न्यू यॉर्क टाइम्स में एक लेख लिखकर राष्ट्रपति ओबामा को सलाह दी कि वे अमेरिका को मौजूदा आर्थिक संकट से उबारने और सरकार के खाली खजाने को भरने के लिए सुपर रिच लोगों से ज्यादा टैक्स वसूल करें।
बफेट के इस प्रस्ताव ने भारत सहित दूसरे अनेक देशों की सरकारों का भी ध्यान खींचा है। लेकिन चिदंबरम ने अपने एक सार्वजनिक भाषण में बफेट के प्रस्ताव का समर्थन कर इसे यहां आम चर्चा का मुद्दा बना दिया है। बहुत सारे लोग यह मानते हैं कि धनी लोग जितना टैक्स फिलहाल दे रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा दे सकते हैं। इससे दो तरह के विचार सामने आ रहे हैं। पहली सोच वाले वे लोग हैं जो कहते हैं कि भारत में ही नहीं, हर जगह टैक्स वसूली का ढांचा नीचे से ऊपर की ओर अपने आप बढ़ता हुआ बनाया जाता है। यानी जिसकी आय कम है, वह कम टैक्स भरता है और जिसकी आय जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, उसकी टैक्स देनदारी भी बढ़ती जाती है। फिर भी अमीर लोगों के पास जितना धन होता है, उसकी तुलना में वे कम टैक्स भरते हैं। उनकी तुलना में ज्यादा टैक्स नौकरी करने वाले भरते हैं, क्योंकि पूंजीपतियों की ज्यादातर कमाई निवेश और कैपिटल गेन से होती है, जिस पर नौकरी की तुलना में कम टैक्स देना पड़ता है। लेकिन उन पर टैक्स बढ़ाएंगे तो टैक्स चोरी होगी और काला धन पैदा होगा। इसलिए सुपर रिच लोगों से ज्यादा टैक्स लेने के बदले हमें टैक्स कलेक्शन का आधार बढ़ाना चाहिए। ऐसे लोगों की पहचान करानी चाहिए, जिन्हें टैक्स देना चाहिए, लेकिन जो दे नहीं रहे हैं।
इसके लिए जरूरी है कि हम कमाई के तरीके को नहीं, कमाई को टैक्स आकलन का आधार बनाएं। इससे उलट दूसरी तरह से सोचने वालों का मानना है कि कमाई के तरीके के हिसाब से टैक्स की दर कम-ज्यादा रखना जरूरी है। जब आप किसी एक सेक्टर को बढ़ावा देना चाहते हैं, या कोई सेक्टर पिछड़ रहा है, तो उसे आगे बढ़ाने के लिए इंसेंटिव देने होंगे। फिर ये पूंजीपति देश के नागरिकों के लिए काम के अवसर भी जुटाते हैं, इसलिए उन पर अतिरिक्त टैक्स लगाना ठीक नहीं होगा। इन दोनों खेमों से अलग हमारा मानना यह है कि सरकार को सुपर रिच क्लास से ज्यादा टैक्स लेने और उससे पैसा छीन कर इसे खुद खर्च करने की जगह, इस क्लास को स्वेच्छा से जन कल्याणकारी कार्यक्रम चलाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अपने देश में कुएं खुदवाने और धर्मशाला बनवाने की परंपरा रही है। लेकिन धनाढ्य तबका इसके लिए तभी आगे आएगा, जब उसे अपने व्यापार के लिए अनुकूल माहौल और सद्कार्यों के लिए उचित श्रेय मिलेगा।

ऐसी क्रूरता क्यों


राजधानी में एक डॉक्टर द्वारा अपनी पत्नी की हत्या किए जाने की घटना ने एक बार फिर सभ्य समाज को शर्मसार किया है। हाल में कुछ और भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें उच्च शिक्षित और सम्मानजनक पद पर कार्यरत पति ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी। ये घटनाएं बताती हैं कि एजुकेटेड और संभ्रांत कहे जाने वाले तबके के भीतर भी स्त्री के प्रति अभी सामंती नजरिया बरकरार है। और वैवाहिक जीवन में चाहे वह अरेंज्ड मैरिज हो या लव मैरिज -अब भी स्त्री-पुरुष की बराबरी का भाव पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है।

आज भी पुरुषों का एक बड़ा वर्ग अपने हाथ में ही सारा नियंत्रण रखना चाहता है। पत्नी के साथ तालमेल बनाकर चलने के बजाय वह नियंता की भूमिका निभाना चाहता है। वह असहमति को बर्दाश्त नहीं कर पाता, इसलिए अकसर पत्नी के प्रति आक्रामक हो उठता है। पतियों के असंयत व्यवहार के ज्यादातर मामले तो सामने आ ही नहीं पाते। यह बात जगजाहिर है कि घर की चहारदीवारी के भीतर स्त्रियों को तरह-तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इसी कारण घरेलू हिंसा कानून बनाने की जरूरत पड़ी। शिक्षित परिवारों में पति-पत्नी के टकराव की बड़ी वजह यह है कि अब स्त्री चुपचाप सब कुछ सहने के लिए तैयार नहीं है। अब वह शिक्षित हो रही है, आत्मनिर्भर हो रही है, लेकिन पुरुष वर्ग अब भी उसे पुराने बंधनों में ही बांधे रखना चाहता है। वह अपने अहं से बाहर नहीं निकलना चाहता। इसलिए विचारों में थोड़ी भी असहमति तनाव का कारण बन जाती है। लेकिन इस तनाव का सौहार्दपूर्वक कोई हल निकालने की कोशिश प्राय: नहीं होती, क्योंकि विवाह के ढांचे से बाहर निकलकर कोई नहीं सोचना चाहता।

हमारे समाज में विवाह तोड़ना आज भी स्त्री-पुरुष के लिए किसी भयंकर पाप की तरह है। दोनों एक ही छत के नीचे दुश्मन की तरह दुखी जीवन बिताना पसंद करते हैं, लेकिन अपने लिए अलग-अलग राह अपना कर सुखी जीवन का विकल्प नहीं अपनाना चाहते। अब भी समाज तलाकशुदा स्त्री-पुरुषों के प्रति सहज नहीं हो पाया है। एक महिला का पुनर्विवाह होना अब भी बेहद कठिन है। कई बार बच्चों की भविष्य की चिंता भी पति-पत्नी को आपसी तनाव के बावजूद अलग नहीं होने देती। फिर हमारा कानून भी तलाक को लेकर उदार नहीं है। उसकी मंशा हरेक विवाह को यथासंभव बचाने की रहती है, इसलिए तलाक की प्रक्रिया को थोड़ा कठिन बनाया गया है। अनचाहे संबंध को ढोने की विवशता भी कई बार लोगों को अतिवादी कदम उठाने को बाध्य करती है। इसलिए विवाह को लेकर माइंडसेट बदलने की जरूरत है। विवाह संबंध बोझ बने, इससे बेहतर है कि पति-पत्नी स्वेच्छा से, सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग हो जाएं। विवाह संबंधों के टूटने पर विलाप न करके स्त्री-पुरुषों के पुनर्विवाह को सामाजिक स्वीकृति देनी होगी। अकेली औरत को सम्मान देना होगा। कानून और नीतियों के स्तर पर भी इस तरह के उपाय करने होंगे कि वैवाहिक संबंधों की जटिलताएं समाप्त हों और स्त्री-पुरुषों का संबंध सहज बने।

Thursday, September 22, 2011

काम का तरीका बदलें



हमारे देश के कुछ हिस्सों में न्यूक्लियर प्लांटों केखिलाफ चल रहे प्रदर्शनों को देख कर आशंका हो रही हैकि कहीं पॉप्युलिज्म के चक्कर में देश के परमाणु कार्यक्रमको ही ग्रहण न लग जाए। फिलहाल महाराष्ट्र के जैतापुर ,पश्चिम बंगाल के हरिपुर और तमिलनाडु के कुडनकुलमपरमाणु संयंत्रों को लेकर विरोध हो रहा है। 

सबसे ताजा मामला कुडनकुलम का है , जिसका कामरोकने के लिए तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता नेप्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और जवाब में प्रधानमंत्री नेवी . नारायणसामी को प्रदर्शनकारियों से बातचीत करनेके लिए तमिलनाडु भेजा। पर्यावरणवादियों औरसामाजिक कार्यकर्ताओं का एक तबका काफी पहले सेपरमाणु संयंत्रों पर सवाल उठाता रहा है। जापान कीफुकुशिमा दुर्घटना के बाद उनकी सक्रियता और बढ़ गई है।उन्होंने परमाणु संयंत्रों के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया है। वे संयंत्रों के बारे में एकतरफा बातें कर रहे हैं, जिससे लोगों का भय और बढ़ रहा है। उनके प्रभाव में राजनेता भी आने लगे हैं। जैसे ममता बनर्जी ने साफ तौरपर कह दिया कि वे हरिपुर में प्रस्तावित न्यूक्लियर प्लांट नहीं लगने देंगी। जयललिता ने भी कुडनकुलम प्लांटकी समस्याओं की गहराई में गए बगैर काम रोकने की बात कह दी , जबकि इसकी आठ में से दो यूनिटें बनकरतैयार हो चुकी हैं और उनमें जल्दी ही उत्पादन भी शुरू होने वाला है। 

वर्ष 2050 तक हम विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होंगे , तब हमें आज से दस गुनी ऊर्जा की जरूरतहोगी। ऊर्जा के हमारे पारंपरिक स्रोत अब दम तोड़ रहे हैं। अगर बिजली बनाने के लिए आज से हम केवल कोयलेका ही इस्तेमाल करें तो इसका भंडार एक दशक में समाप्त हो जाएगा। कमोबेश यही हाल तेल और गैस का भी है।ऐसे में परमाणु बिजली ही एकमात्र विकल्प है। हां , इसमें कोई दो राय नहीं है कि परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा कोलेकर हमें हर संभव व्यवस्था करनी होंगी। केंद्र सरकार वह सुनिश्चित कर रही है। लेकिन उसका दायित्व सिर्फपरमाणु समझौता कर लेना और उसके संयंत्रों का निर्माण शुरू कर देना भर नहीं है। 

हम अपने सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की इस राय से सहमत नहीं हैं कि सरकार को भय फैलाने वालेशरारती तत्वों की उपेक्षा करनी चाहिए और संयंत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सख्ती से उसका क्रियान्वयनकराना चाहिए। हमारी राय यह है कि इन विरोध प्रदर्शनों से सबक लेते हुए सरकारी एजेंसियों को अपने काम कातरीका बदलना चाहिए। लोकतंत्र में ऐसी संवेदनशील परियोजनाएं शुरू करने से पहले स्थानीय नागरिकों कोविश्वास में लेना जरूरी है। यदि सरकारी एजेंसियां लोगों से पहले से संवाद करें और उन्हें जरूरी जानकारी देतीरहें , तो न गलतफहमी फैलेगी , न शरारती तत्वों को ऐसा करने का मौका मिलेगा। 

आज की तारीख में हर परियोजना के साथ एक सी समस्या नहीं है , कहीं पुनर्वास का मामला है तो कहीं रोजगारका। अगर पहले ही जमीनी स्थितियों का विश्लेषण किया गया होता तो किसी को विरोध करने का अवसर ही नहींमिलता।

स्थायी अशांति की ओर

अगले अमेरिकी आम चुनाव से पहले अफगानिस्तान में जैसे-तैसे कामचलाऊ शांति कायम कर लेने का ओबामा प्लान एक बड़ी राजनीतिक हत्या के चलते अचानक हवाई बनकर रह गया है। प्रो. बुरहानुद्दीन रब्बानी भले ही दो बार अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रह चुके हों और अपने कट्टरपंथी विचारों के चलते उन्हें तालिबान के साथ किसी संभावित समझौते के लिए सबसे सटीक आदमी समझा जाता रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि अभी के अफगानिस्तान में उनकी कोई बड़ी राजनीतिक हैसियत नहीं रह गई थी। वे तो अफगानिस्तान पीस काउंसिल के अध्यक्ष बनकर दुबई में इज्जत और आराम की जिंदगी बिता रहे थे।

इसके बावजूद तालिबान ने जिस तरह उन्हें बातचीत का झांसा देकर काबुल बुलाया और आत्मघाती हमलावर के जरिए किले सरीखे उनके घर में घुसकर उनकी जान ली, वह बताता है कि तालिबान के साथ बराबर की सौदेबाजी के आधार पर किसी समझौते की उम्मीद करना करजई और अमेरिका के लिए खुली आंखों सपना देखने जैसा ही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देशवासियों को अफगानिस्तान में हालात पटरी पर आने का संदेश देने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, लेकिन जमीन पर उनके यह संदेश पूरी तरह बेमानी साबित हो रहे हैं। यहां से आगे अफगानिस्तान शांति के रास्ते पर बढ़ेगा, इसकी उम्मीद बहुत कम है। हाल ही में तालिबानियों ने राष्ट्रपति हामिद करजई के सगे भाई और पख्तूनों के बीच उनके सबसे भरोसेमंद प्रतिनिधि को भी काफी बेरहमी से मौत के घाट उतारा है। लिहाजा ऐसी अफवाहों पर यकीन करने की कोई वजह नहीं बनती कि करजई अंदरखाने तालिबान के साथ बातचीत में जुटे हैं और गठबंधन फौजों की अफगानिस्तान से संभावित विदाई के पहले अमेरिका की नाराजगी का जोखिम उठाते हुए भी तालिबान नेता मुल्ला उमर के साथ किसी न किसी तरह का समझौता कर डालेंगे। बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या का सबसे सीधा संकेत यही निकलता है कि आने वाले कुछ महीने अफगानिस्तान के लिए काफी कत्लोगारत के होने वाले हैं।

रब्बानी का ताजिक होना अगर ताजिकों की नाराजगी और नॉर्दर्न अलायंस के दोबारा सिर उठाने का सबब बना तो इस देश में इराक जैसे ही गृहयुद्ध की आशंका प्रबल हो जाएगी। हर हाल में यह घटनाक्रम अफगानिस्तान पर अमेरिकी पकड़ कमजोर होने का इशारा करता है। भारत के लिए गृहयुद्ध से ग्रस्त अफगानिस्तान तालिबानी कब्जे वाले अफगानिस्तान से कम बुरा नहीं होगा, लिहाजा यहां अमेरिका पर निर्भरता छोड़कर अपने लिए अलग जमीन तलाशना भारतीय कूटनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती होनी चाहिए।

Tuesday, September 20, 2011

लोकायुक्त का इस्तीफा


कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस शिवराज पाटिल काअपनी नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद अपना इस्तीफाराज्यपाल को सौंप देना कोई ऐसी घटना नहीं है , जिसेसिर्फ एक राज्य तक सीमित मानकर दरकिनार कर दियाजाए। कई कारणों से , खासकर राज्य के मुख्यमंत्री रहेबीजेपी के कद्दावर नेता बी . एस . येदयुरप्पा के इस्तीफेको लेकर कर्नाटक का लोकायुक्त पद पिछले कई महीनों सेचर्चा में है। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि कर्नाटकदेश का वह अकेला राज्य है , जहां इस पद पर आसीनव्यक्ति मुख्यमंत्री तक पर हाथ डालने की स्थिति में है। 

जिस लोकपाल विधेयक को लेकर इधर देश में इतनीउम्मीद बांधी जा रही है , उसे भी कई मामलों में कर्नाटकके लोकायुक्त को ही अपना रोल मॉडल मानकर चलनापड़ सकता है। जस्टिस शिवराज पाटिल का इस्तीफालोकपाल की धारणा से जुड़ी व्यावहारिक जटिलताओं की ओर संकेत करता है , लिहाजा इससे जुड़े ब्यौरों को कुछज्यादा ही गौर से देखा जाना चाहिए। आगामी 22 सितंबर को लोकायुक्त की विशेष अदालत में येदयुरप्पा परचल रहे भ्रष्टाचार के दो मुकदमों में से एक की सुनवाई होने वाली थी और बीते 15 सितंबर को उन्होंने इसमेंअपनी संभावित गिरफ्तारी के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत हासिल कर ली थी। 

जस्टिस पाटिल के इस्तीफे से इस सुनवाई पर कोई असर पड़े या न पड़े , लेकिन येदयुरप्पा के लिए यह कुछ नकुछ राहत का विषय जरूर होगा। इतना तय है कि यह इस्तीफा सीधे तौर पर किसी भ्रष्टाचार में फंसने की वजहसे नहीं , बल्कि एक लोकापवाद को आधार बनाते हुए दिया गया है , लिहाजा लोकायुक्त पद की गरिमा को इससेकोई ठेस नहीं लगी है। जस्टिस पाटिल पर आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक बिल्डिंग सोसायटीज एक्ट नियमावलीकी एक उपधारा का उल्लंघन करके बेंगलूरु में पहले से अपने दो प्लॉट होते हुए एक सोसायटी से तीसरा प्लॉटभी खरीद लिया था। अपनी सफाई में जस्टिस पाटिल का कहना था कि यह प्लॉट उनकी पत्नी ने नीलामी मेंखरीदा था , वह भी तब , जब संबंधित सोसायटी के दिवालिया हो जाने की स्थिति में राज्य सरकार ने उसेनियमावली के बंधन से मुक्त कर दिया था। 

यह कोई कानूनी मामला नहीं है , न ही पद के दुरुपयोग जैसी कोई बात इसमें शामिल है , क्योंकि प्लॉट खरीदेजाने के समय जस्टिस पाटिल किसी सरकारी या न्यायिक पद पर आसीन नहीं थे। इसके बावजूद उनकोलोकायुक्त के पद से हटानेे के लिए यह आरोप पर्याप्त सिद्ध हुआ , क्योंकि इस पद पर आसीन व्यक्ति का चरित्रजिस शीशे जैसा होने की अपेक्षा की जाती है , उसमें कम से कम एक बाल तो इससे आ ही गया। सवाल यह है किजब देश में लोकपाल का कानून आ जाएगा और इससे जुड़ी संस्थाएं मुख्यमंत्रियों से लेकर स्वयं प्रधानमंत्री तकपर नजर रखने लगेंगी , तब इन पर आसीन होने के लिए ऐसे लोग कहां से लाए जाएंगे , जिन पर कहीं से कोईआरोप लगाया ही न जा सके ? ऐसे कुछ लोग मिल भी गए तो सत्ताधारियों की ताकत के सामने उन्हें लगातारआरोपमुक्त कैसे रखा जाएगा ? और आरोप लगने के बाद भी वे अगर अपने पद पर डटे रहे तो सरकारी लोगोंऔर उनमें फर्क क्या रह जाएगा ?

Monday, September 12, 2011

महिलाओं पर अत्याचार


पाकिस्तान में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की बढ़तीघटनाओं पर विमिन एक्टिविस्ट डॉ . रक्षंदा परवीन नेडेली टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में गहरी चिंता जताईहै। वह लिखती हैं कि देश में महिलाओं के खिलाफअत्याचारों की जैसे बाढ़ आ गई है। देश के अनेक प्रांतों मेंइन घटनाओं की बढ़ोतरी से साबित होता है कि प्रांतीयसरकारें और राष्ट्रीय विधायी संस्थाएं ऐसे मामलों कीरोकथाम करने और दोषियों की धरपकड़ करने में बिल्कुलनाकाम साबित हो रही हैं। रक्षंदा ने हैरानी जताते हुएलिखा है कि अगर बलूचिस्तान के एक मामले को नजीरमाना जाए तो वहां के कुछ पुरुष विधायकों ने परंपरा केनाम पर 2008 में एक महिला को जिंदा जलाने को सहीठहराया था। यही नहीं , इस मामले की निंदा करते हुएजब सिंध की प्रांतीय असेंबली ने एक कड़ा प्रस्ताव रखा ,तो उस पर ज्यादातर विधायक खामोश रहे थे। पाकिस्तान के बारे में एक बड़ा सच यह है कि आज भी ज्यादातरगरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े समाजों में महिलाओं और लड़कियों पर होने वाले अत्याचार की सुध नहीं लीजाती है। अगर दर्ज मामलों की ही बात की जाए तो देश में पिछले तीन साल में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के24,119 मामले हुए हैं। इसी से अंदाजा लग जाता है कि पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति कितनी दयनीय है।इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या एक इस्लामी राष्ट्र में महिलाओं को न्याय और समानअधिकार दिलाने का काम पूरी निष्पक्षता से हो सकता है ? या फिर महिलाओं के अत्याचार के खिलाफ यहां उठीआवाजें सिर्फ कुछ आकर्षक नारों तक ही सीमित रह जाएंगी।

बांग्लादेश के साथ रिश्तों का असर बाकी पड़ोसियों


रंजीत कुमार
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बांग्लादेश दौरे (6-7 सितंबर) पर यदि ममता बनर्जी ने पानी नहीं फेरा होता तो इसकी सफलता में चार चांद लग जाते। लेकिन शेख हसीना से बातचीत के बाद जो भी समझौते हुए और जो सहमतियां बनीं, उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि दोनों देशों ने रिश्तों की ऐसी बुनियाद रखी है जिस पर मजबूत इमारत खड़ी की जा सकती है। हालांकि इसके लिए भविष्य में दोनों देशों की सरकारों को राष्ट्रीय संकल्प और लेनदेन की भावना के साथ काम करना होगा। जहां तक सवाल उपलब्धियों का है तो दोनों देशों ने 1974 से लटके शेख मुजीब-इंदिरा सीमा समझौते को संपन्न कर आपसी तनाव की एक बड़ी वजह दूर कर ली है।
शेख हसीना की पहल
कुल 4090 किलोमीटर लंबी सीमा में मात्र छह किलोमीटर के इलाके में ही जहां-तहां पड़ने वाले गांव और कुछ हजार एकड़ जमीन विवाद की जड़ में थी जिस पर लेनदेन का समझौता कर दोनों देशों ने सीमा विवाद को हमेशा के लिए सुलझा लिया है। सीमा मसला दोनों देशों के बीच तनाव की एक बड़ी वजह था और यह बांग्लादेश में भारत विरोधी राजनीतिक भावनाएं भड़काने का जरिया बना रहता था। वहां की भारत विरोधी उग्र ताकतों को इस काम में पाकिस्तान की आईएसआई से हर तरह की मदद मिलती थी। भारत की इस शिकायत को अवामी लीग की नेता मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जब दूर किया तो दोनों देशों के बीच सहयोग बनाने और शक दूर करने की एक नई जमीन बनी।
प्रत्यर्पण संधि का मसला
कहते हैं , ताली दोनों हाथ से बजती है। जब बांग्लादेश की मौजूदा सरकार ने असम के उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर भारत के साथ सुरक्षा मसलों में सहयोग करने का प्रमाण दिया तब भारत ने भी दो कदम आगे बढ़ कर बांग्लादेश को तीस्ता नदी के जल के बंटवारे में अधिक उदारता दिखाई। लेकिन ऐन मौके पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा इसे मंजूरी नहीं देने से बांग्लादेश में भारत विरोधी ताकतों को फिर बल मिलेगा। शायद इनके दबाव में ही दोनों देशों के बीच प्रस्तावित प्रत्यर्पण संधि नहीं हो सकी। इसकी बदौलत अल्फा नेता अनूप चेतिया का भारत प्रत्यर्पण आसान हो जाता। लेकिन बांग्लादेश ने भरोसा दिलाया है कि इस मसले पर बातचीत जारी रहेगी।
पूरे 12 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का बांग्लादेश दौरा हो रहा था और इसे लेकर वहां भारी उत्साह था। दो पड़ोसियों का आपस में इतना कम संवाद होना मधुर रिश्तों के लिए ठीक नहीं है। लेकिन भारत की सुरक्षा चिंताएं दूर करने के भरोसे के साथ ही प्रधानमंत्री के ढाका दौरे के तैयारी की गई। करीब एक साल से इस दौरे की सफलता की तैयारी की जा रही थी। इसके तहत भारत ने बांग्लादेश को कई तरह की व्यापारिक रियायतें भी दीं जिससे बांग्लादेशी कपड़ा उद्योग को भारी लाभ होगा। दोनों देशों के बीच पांच अरब डालर का सालाना व्यापार पिछले साल हुआ है जो भारत की एकपक्षीय रियायतों के बावजूद काफी हद तक भारत के पक्ष में झुका हुआ है। बांग्लादेश को भारत ने जो नवीनतम रियायतें दी हैं उनसे बांग्लादेश की शिकायत काफी हद तक दूर होगी।
बांग्लादेश को विश्व व्यापार संगठन ने सबसे अल्प विकसित देश ( एलडीसी ) का दर्जा दिया है। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन ( सार्क ) के तहत भी मुक्त व्यापार समझौता करने पर सदस्य देशों में सहमति हुई है। इस नाते भारत का फर्ज बनता था कि वह बांग्लादेश को व्यापारिक रियायतें देकर वहां की गरीबी और बेरोजगारी दूर करने में मदद करे। ऐसा होने पर बांग्लादेश से भारत को होने वाले अवैध आव्रजन पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी। बांग्लादेश के रास्ते भारत के उत्तर - पूर्वी राज्यों के बीच पारगमन की सुविधा पर सहमति के बावजूद समझौता नहीं हुआ और न ही चटगांव बंदरगाह से होकर भारतीय माल के निर्यात पर बांग्लादेश ने कोई समझौता किया लेकिन बांग्लादेश इसके लिए तैयार दिखता है और भारत की व्यापारिक रियायतों के बाद वहां धीरे - धीरे भारत को इस तरह की सुविधा देने का माहौल बन सकता है।
भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग का रिश्ता दक्षिण एशिया के दूसरे देशों के लिये भी मिसाल बन सकता है। यदि भारत और बांग्लादेश ने आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते गहरे किये तो इससे होने वाले लाभों से दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी सबक लेंगे। श्रीलंका के साथ भारत ने पहले ही आर्थिक रिश्ते गहरे किए हैं और दोनों के बीच सुरक्षा मसले को लेकर भी परस्पर समझ बनी है। भूटान के साथ भारत के रिश्ते पहले से ही काफी गहरे हैं। नेपाल में अंदरूनी राजनीति की वजह से वहां भारत विरोधी भावनाएं भड़कायी जाती हैं और वहां की सरकार भारत के खिलाफ चीन का कार्ड खेलने की कोशिश करती है। मालदीव के साथ भारत के आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते काफी प्रगाढ़ हैं ही। अफगानिस्तान भी भारत के साथ अच्छे राजनीतिक रिश्ते रहते हुए आर्थिक रिश्तों को गहरा नहीं कर पा रहा है।
पड़ोसी देशों पर असर
लेकिन बांग्लादेश जब भारत की अर्थव्यवस्था से लाभ उठायेगा तब पाकिस्तान का व्यापार जगत भी भारत के साथ इसी तरह के रिश्ते बनाने का दबाव अपनी सरकार पर डालेगा। शायद इसके बाद पाकिस्तान अपनी जमीन से होकर अफगानिस्तान को भी भारत के साथ व्यापार करने की सुविधा दे दे , क्योंकि इससे पाकिस्तान को राजस्व की आय होगी। इस तरह भारत और बांग्लादेश के आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते दक्षिण एशिया के दूसरे देशों के लिए मिसाल साबित होंगे और दूसरे पड़ोसी देश भी भारत की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए इसके साथ रिश्ते सामान्य बनाने की कोशिश करेंगे। इस तरह पूरे दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग का एक नया माहौल बनेगा। इसलिए बांग्लादेश के साथ भारत के बेहतर रिश्तों को केवल दो देशों के संबंधों के मद्देनजर ही नहीं देखा जाना चाहिए। इन रिश्तों का सुधरना भारत के लिए पूरे दक्षिण एशिया के संदर्भ में व्यापक महत्व रखता है।

छवि सुधार की मुहिम


अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर पहले भले ही कई आशंकाएं जताई जाती रही हों, लेकिन इसका सार्थक असर अब कई रूपों में नजर आने लगा है। प्राय: सभी राजनैतिक दल अपनी छवि सुधारने की मुहिम में जुट गए हैं।
मुख्य विपक्षी दल बीजेपी की बात करें तो उसने करीबन एक महीने के अंतराल में अपने दो मुख्यमंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदयुरप्पा को हटे कुछ ही हफ्ते हुए थे कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को भी बीजेपी हाईकमान ने चुटकियों में दफा कर दिया।
उनकी जगह दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए पूर्व मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी ने अपना पद संभालते ही जिस तरह के संकेत दिए हैं, उनमें भी अन्ना इफेक्ट खूब काम करता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री ने अपनी कैबिनेट सहित तमाम आईएएस और आइपीएस अधिकारियों से महीने भर के भीतर अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने को कहा है।
यह आश्वासन भी दिया है कि वह खुद अपनी संपत्ति का ब्यौरा निश्चित समयावधि में सार्वजनिक करेंगे। यही नहीं, खंडूरी ने दो महीने के अंदर ही राज्य में एक प्रभावी लोकायुक्त की नियुक्ति कराने का संकेत भी दे दिया है। वह बिहार की तर्ज पर बेनामी प्रॉपर्टी बिल लाने की बात भी कर रहे हैं ताकि भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की गलत तरीके से अर्जित संपत्ति को जब्त किया जा सके और उनमें कानून का डर पैदा किया जा सके।
जिस तरह खंडूरी अच्छे प्रशासन के लिए उत्साहित नजर आ रहे हैं, उससे ऐसा लग रहा है कि बीजेपी आलाकमान की नजर में पिछला प्रशासन जरूर कुछ कमजोर और पार्टी छवि को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा होगा। खुद बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पूर्व मुख्यमंत्री निशंक की इस बात के लिए प्रशंसा ही की है कि उन्होंने पार्टी का आदेश स्वीकार किया। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया है कि उन पर कोई आरोप नहीं है, बल्कि यह बदलाव आगामी चुनावों के मद्देनजर किया गया है।
लेकिन उसका यह रवैया आंख के सामने मौजूद चीज की अनदेखी करने जैसा है। बीजेपी के लिए अपनी छवि सुधारने का अर्थ अगर यही है कि गलत लोगों को तब तक अभयदान दिया जाए जब तक पानी नाक से ऊपर न जाने लगे, और इस क्रम में जब सत्ता हाथ से जाती दिखे तब उन्हें किनारे करके कोई साफ चेहरा आगे कर दिया जाए, तो देखना होगा कि ऐसा करके कहीं वह भारतीय मतदाताओं के राजनीतिक विवेक की अनदेखी तो नहीं कर रही है।

हॉकी में भारत का धमाल


लगता है , भारतीय हॉकी के सुनहरे दिन लौटने वाले हैं। एशियन चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में अपने चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को हराकर एकदम नए खिलाड़ियों से सजी हमारी टीम ने यह साबित कर दिया है कि अब उसे हल्के में लेना किसी को भी भारी पड़ सकता है।
इस खिताबी जीत से भारतीय हॉकी में नया जोश तो पैदा ही होगा , साथ में हमारी टीम के प्रति दुनिया का नजरिया भी बदलेगा। अभी हाल तक भारतीय हॉकी टीम में वैसे तेवर नजर नहीं आ रहे थे कि उससे किसी बड़ी जीत की उम्मीद की जाती।
पिछली कई हारों के जख्म ताजा थे , उस पर कई सीनियर खिलाड़ी भी टीम से नदारद थे। शिवेंद्र सिंह , तुषार खांडेकर और अर्जुन हलप्पा जैसे धुरंधर चोट की वजह से टूर्नामेंट में खेलने नहीं जा सके थे। इससे भी बड़ी मुश्किल तब खड़ी हुई जब अभ्यास कैंप को बीच में ही छोड़ देने के कारण ऑलराउंडर सरदार सिंह और ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह पर बैन लगा दिया गया।
ऐसे में एकदम नए और तकरीबन अनुभवहीन खिलाडि़यों वाली इस टीम का खिताब जीतना काबिलेतारीफ ही कहा जाएगा। गजब यह कि भारत ने यह टूर्नामेंट बिना कोई मैच गंवाए जीता है। फाइनल मैच में फैसला बेशक टाईब्रेकर के जरिए हुआ पर वहां हमारे नवोदित खिलाडि़यों ने जैसा संयम दिखाया , उससे वे शाबासी के हकदार बनते हैं।
ऐसे नाजुक मौकों पर तो अनुभवी खिलाड़ियों का भी पसीना छूट जाता है और वे गलती कर बैठते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि नए विदेशी कोच ऑस्ट्रेलिया के माइकल नॉब्स का मार्गदर्शन टीम के लिए फायदेमंद रहा।
टीम ने खिताब जीत कर साबित कर दिया है कि नॉब्स सही रास्ते पर हैं। असल में शैली के मामले में भारतीय हॉकी ऑस्ट्रेलियाई हॉकी के काफी करीब है। भारतीय खिलाड़ी ताकतवर यूरोपीय खिलाडि़यों पर अपने कौशल के बल पर ही भारी पड़ते हैं। यूरोपीय टीमों को चुनौती देनी है तो हमें अपनी कलाकारी पर ज्यादा भरोसा करना होगा।
इसी से हम दुनिया में अपनी हॉकी का लोहा मनवा सकते हैं। बतौर कोच पहले ही टूर्नामेंट में भारत को चैंपियन बनवाने में योगदान करने वाले नॉब्स भारतीय खिलाड़ियों की इस ताकत को परखने और उसका इस्तेमाल करने में सफल रहे हैं। अगले टूर्नामेंटों में वह टीम से जुड़ी तमाम जानकारियों का इस्तेमाल करते हुए खिलाड़ियों को उनकी विशेषताओं के मुताबिक जिम्मेदारी सौंप सकते हैं।
इसके समानांतर एक बड़ा काम और करने की जरूरत है। वह है देश के भीतर हॉकी को उसका खोया गौरव वापस दिलाना। चैंपियंस ट्रॉफी जैसी जीत देश में हॉकी को उसका कुछ सम्मान तो वापस दिलाएगी , पर हॉकी के मामले में ' चक दे इंडिया ' जैसा जोश जगाने के लिए अभी और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
हॉकी खिलाड़ियों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के साथ-साथ उनके चयन और उनकी ट्रेनिंग का स्तर सुधार कर ही तस्वीर कुछ उजली की जा सकती है।

Sunday, September 11, 2011

बिहार स्पेशल कोर्ट ऐक्ट


भ्रष्टाचार दूर करने के बारे में बातें तो सब करते रहे हैं, लेकिन आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करने का माद्दा कम ही नजर आता है। बहरहाल, इधर भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही तेज हवा ने अपना कारगर असर दिखाना शुरू कर दिया है और इस मामले में बाजी मारी है बिहार ने।
बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट 2009 के तहत सबसे पहले आईएएस शिव शंकर वर्मा को दंडित किया गया है। उन पर 1.44 करोड़ की अघोषित संपत्ति रखने का केस इस एक्ट के तहत चलाया गया था। पटना हाई कोर्ट के निर्देशानुसार उनका तीन मंजिला मकान जब्त कर लिया गया और उसे मानव संसाधन विभाग को सौंप दिया गया।
अब इस इमारत में एक स्कूल चलाया जा रहा है। यही नहीं, इस किस्म के फिलहाल 17 केस बिहार में अभी और चल रहे हैं। बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 और बिहार स्पेशल कोर्ट रूल्स, 2010 के खिलाफ कई बड़े अधिकारियों द्वारा पटना हाई कोर्ट में काफी पहले याचिका दायर की जा चुकी है।
याचिका दायर करने वालों में राज्य के पूर्व डीजीपी नारायण मिश्रा भी शामिल रहे हैं। इस याचिका में उन प्रावधानों को चैलेंज किया गया था जो राज्य सरकार को अधिकारियों की अघोषित संपत्ति जब्त करने का अधिकार देते हैं। अफसरों की यह कोशिश अब तक रंग नहीं लाई है, इससे लगता है कि बिहार में भ्रष्ट अफसरों की खैर नहीं है।
भ्रष्टाचार से जुड़े इनके केसों की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का निर्णय कर राज्य सरकार ने जनता की पुरानी ख्वाहिश को व्यावहारिक रूप दे दिया है। स्पेशल कोर्ट एक्ट को केंद्र सरकार की मंजूरी तब मिली थी जब स्टेट एसेंबली में यह तय कर लिया गया कि जो अधिकारी अपनी आय से अधिक अप्रमाणित संपत्ति रखेंगे, उनकी संपत्ति को राज्य सरकार जब्त कर सकती है।
इस एक्ट के तहत वही पब्लिक सर्वेंट अर्थात अधिकारी आएंगे जो अपना वेतन राज्य सरकार के खजाने से पाते हों। देखने वाली बात यह है कि क्या देश के अन्य राज्यों की सरकारें भी बिहार का अनुसरण करने की कोशिश करेंगी? अगर वे ऐसा करती हैं तो इससे दो लाभ होंगे। एक तो यह कि लोग भ्रष्टाचार से अर्जित अचल संपत्ति के सार्वजनिक इस्तेमाल को देख खुश होंगे।
दूसरे, अन्य भ्रष्ट अधिकारियों के लिए यह एक सबक का काम भी करेगा। आज के दौर के लिए यह सबक सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि भ्रष्टाचार ने इस देश को करीब-करीब खोखला कर दिया है। यदि इस किस्म के मामले बिहार के अलावा और जगहों पर भी इसी परिणति तक पहुंचेंगे तो स्वयं को लगभग प्रभु मानकर चलने वाले बड़े सरकारी अधिकारियों की निरंकुशता पर रोक लगेगी। साथ ही इससे ऐसा माहौल भी बनेगा जिसमें बगैर कुछ लिए-दिए भी काम हो सकने की संभावना बलवती होगी।

Friday, September 9, 2011

संसद में गतिरोध


ज्यादा जिम्मेदार बनें
एनबीटी का मत
इस गुरुवार संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। सरकार ने तय किया था कि इस सत्र के 26 कामकाजी दिनों में 32 बिल संसद में लाए जाएंगे। पर लोकपाल, भ्रष्टाचार और महंगाई आदि मुद्दों को लेकर हुए हंगामे के कारण सरकार 12 बिल ही सदन में पेश कर सकी और उनमें से सिर्फ 10 पारित हो सके। देश के विकास और व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिहाज से संसद में कम कामकाज होना एक गंभीर बात है।
फूड सिक्योरिटी और मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम के संशोधन बिल समेत कई ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक हैं जिन पर इस सत्र में चर्चा होनी थी, पर वह नहीं हो सकी। इसके लिए सरकार और विपक्ष, दोनों की आलोचना की जा सकती है। अगर देश की संसद ही खुद तय कार्यक्रमों के अनुसार नहीं चलेगी, तो इससे एक गलत संदेश जाएगा। इसका असर देश की छवि पर भी पड़ता है। अचानक पैदा हुए किसी संकट का नोटिस लेना सही है पर उस मुद्दे को लेकर बहस में उलझ जाना और उसके लिए संसद का कामकाज ठप कर देना बिल्कुल उचित नहीं है। अब वह दौर गया जब किसी मसले पर लंबे आंदोलन और हड़तालें हुआ करती थीं। 90 के दशक में हुए उदारीकरण का सबसे अहम सबक यही है कि वक्त किसी भी कीमत पर बर्बाद न हो। अपनी पेशागत जरूरतों के कारण समय का महत्व समझ चुकी देश की नौजवान पीढ़ी संसदीय कामकाज में ऐसी लेटलतीफी देखकर हैरान है। जन हित के बिलों को लेकर संसद का यह रवैया काफी खतरनाक है।
दूसरा मत
यह अगंभीरता नहीं है
अनिल चमडि़या, राजनीतिक विश्लेषक
संसद सत्र का तयशुदा कार्यक्रमों के अनुसार नहीं चलना अगंभीरता का परिचायक नहीं है। पिछले चालीस वर्षों में नौ बार लोकपाल विधेयक पारित नहीं किया जा सका। मौजूदा संसद में महंगाई पर नौ बार बहस हो चुकी लेकिन सरकार महंगाई को रोकने में खुद को लाचार घोषित कर चुकी है। इसीलिए संसद की गंभीरता को सत्र के चलने व नहीं चलने की भाषा के दायरे में ही नहीं देखा जा सकता है। संसद का मंच केवल सरकारी बिलों को पारित करने के लिए नहीं होता है। सत्ता पक्ष की यह कोशिश होती है कि संसद उसके पक्ष के मंच के रूप में तब्दील हो जाए। यह संसद की गंभीरता पर चोट होती है।
एक आम संसद सदस्य की संसद के भीतर ताकत कमजोर हुई है। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी को जीरो ऑवर में 15 मिनट तक राष्ट्र को संबोधित करने का मौका मिला। संसद के इतिहास की यह पहली घटना थी। संसद के भीतर आम और खास का एक फर्क साफ -साफ दिखता है। संसद में जितने समय तक कामकाज होता है यदि उसका मूल्यांकन किया जाए तो संसद की गंभीरता का अंदाजा नहीं मिलता। संसद सदस्यों की उपस्थिति से लेकर बहस की भाषा और सरकार के दृष्टिकोण से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
राजनेता महज पब्लिक फेस के लिए चिंतित होते है। गंभीरता का अर्थ जनहित को लेकर राजनीतिक पार्टियों में सक्रियता है। संसद का सत्र प्रश्नकाल से शुरू होता है और उसे चलाए रखने पर पाटिर्यां सबसे ज्यादा गंभीर होने का भाव प्रदशिर्त करती हैं लेकिन पूछे जाने वाले प्रश्नों और इन पर सरकार के रुख का अध्ययन करें तो पाया जा सकता है कि आमतौर पर सरकार संसद के प्रति लापरवाह हुई है। फिलहाल संसद की जो चिंतनीय स्थिति दिख रही है उसकी वजह यह है कि संसद बहुदलीय प्रणाली से दो पाटीर् प्रणाली की तरफ बढ़ रही है।

एक और रथयात्रा


लालकृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध रथयात्रा निकालने की घोषणा की है। आडवाणी फिलहाल संसदीय विपक्ष के सबसे कद्दावर नेता हैं और इस मुद्दे पर देश में जितना आक्रोश देखा जा रहा है , उसे ध्यान में रखते हुए उनके इस कदम का नैतिक औचित्य समझ में आता है। लेकिन जहां तक मामला इसके राजनैतिक औचित्य का है तो वहां सवाल ही सवाल भरे पड़े हैं। देश के आम आदमी के लिए इस प्रस्तावित यात्रा से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता यही होगी कि लगभग स्वत : स्फूर्त ढंग से उभरी भ्रष्टाचार विरोधी चेतना को इससे कहीं कोई झटका तो नहीं लगेगा।
जन लोकपाल विधेयक के लिए चल रहा जो आंदोलन इस चेतना की मुख्य अभिव्यक्ति बना हुआ है , उसका स्वरूप अब तक अराजनीतिक रहा है। किसी एक पार्टी का इसे भुनाने के लिए आगे आना लोगों में इसके प्रति अरुचि पैदा कर सकता है। वह भी तब , जब संबंधित पार्टी - बीजेपी - की कई राज्य सरकारों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने या इसके प्रति नरम रवैया अपनाने के आरोप मीडिया में छाए हुए हों। दूसरा खतरा इस रथयात्रा के असर में समूची भ्रष्टाचार विरोधी चेतना को ही सांप्रदायिक रंग दे दिए जाने का है। अक्टूबर 1990 और नवंबर - दिसंबर 1992 के महीने इतिहास में भले ही क्रमश : इक्कीस और उन्नीस साल पीछे छूट गए हों लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की ख्याति और स्मृति आज भी उनकी इन्हीं दो यात्राओं को लेकर है। इनके बाद वे चार और यात्राओं पर निकले , लेकिन उनका सन - संवत भी अब लोगों को याद नहीं है।
यह सही है कि आडवाणी की उपरोक्त दोनों राम रथयात्राओं ने उन्हें देश में और खुद अपनी पार्टी में भी कमोबेश अटल बिहारी वाजपेयी के कद का नेता बनाया , लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी का दर्जा विपक्ष की सबसे सुसंगत पार्टी से घटाकर उग्र सांप्रदायिक नारों की सियासत करने वाली पार्टी जैसा बना देने में भी सबसे बड़ी भूमिका इन्हीं की रही। यह एक विडंबना ही है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर खुद को बुरी तरह घिरी पा रही कांग्रेस ने आडवाणी की यात्रा - घोषणा का स्वागत किया है। इस सियासी फंदे का अहसास विपक्ष के सबसे कद्दावर नेता को समय रहते हो जाना चाहिए

9/11 के बाद से कितना बदला अमेरिका


सी. उदय भास्कर
अगले रविवार को 11 सितंबर 2011 को अमेरिका में हुई दुखद घटनाओं की दसवीं बरसी है। यह देखना भारत के लिए भी उपयोगी होगा कि इस एक दशक ने एक राष्ट्र के रूप में और संसार में लोकतंत्र के सबसे पुराने और सबसे ऊर्जस्वी प्रतीक के रूप में अमेरिका पर कैसा असर डाला है। इस असर को ज्यादा अच्छी तरह समझने के लिए पिछले 20 वर्षों में अमेरिका की बदली हैसियत और चाल-ढाल पर नजर डालना श्रेयस्कर होगा।
शीतयुद्ध की जीत
1991 के अंत में बिल्कुल अप्रत्याशित ढंग से शीतयुद्ध की समाप्ति हुई और अमेरिका ने सोवियत संघ के खिलाफ सीधे एक भी गोली चलाए बगैर इसे जीत लिया। यह बात जगजाहिर थी कि अफगान युद्ध के दौरान बिन लादेन किस्म के व्यक्तियों और अलकायदा किस्म की विचारधारा की मदद से अमल में लाई गई घेरेबंदी की रणनीति ने पूर्व सोवियत संघ के नाटकीय विघटन को आकार दिया था।लेकिन यह जीत एक कीमत चुकाकर हासिल की गई थी। 9/11 की शोकांतिका के बीज लंबे खिंचे अफगान युद्ध के दौरान ही बोए जा रहे थे। एक हाथ में कलाशनिकोव और दूसरे में कुरान पकड़े जिन मुजाहिदीनों की मदद से अमेरिका ने दिसंबर 1991 में शीतयुद्ध को उसके अंजाम तक पहुंचाया था, वे ही इसके बाद के सालों में लौट कर खुद उसी पर हमला करने चले आए।
पर्ल हार्बर की याद
1991 के अंतिम दौर में अमेरिका की हैसियत दुनिया के दारोगा या एकमात्र सुपरपावर की थी। जनवरी 1991 में कुवैत को लेकर इराक के खिलाफ हुई जंग में चमत्कारिक जीत ने अमेरिकी सेना के उत्साह और आत्मविश्वास को चरम पर पहुंचा दिया। तब तक अमेरिका वियतनाम की छाया से मुक्त हो चुका था। क्लिंटन के कार्यकाल के पहले दौर में अमेरिका को लगता था कि वह विश्व को अपने मुताबिक चला लेगा, लेकिन 1991 के अंत और 2001 का फर्क वाकई विस्मयकारी है। सितंबर 2001 में ट्विन टावर्स पर हुए हमले से पैदा हालात की तुलना 1941 में पर्ल हार्बर में लगे झटके से की जा सकती है।
9/11 की घटना के 10 साल बाद अमेरिका की एक उपलब्धि की तो सराहना करनी ही होगी। वाइट हाउस और अमेरिकी प्रशासन के विभिन्न अंग अपने इस मूलभूत लक्ष्य को पाने में सफल रहे कि अमेरिका पर फिर कोई आतंकी हमला न हो। इसके लिए पूरे सिस्टम का पुनर्मूल्यांकन किया गया और सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर व विभिन्न संस्थाओं के कामकाज को नए सिरे से व्यवस्थित किया गया। नवंबर 2002 में गठित 9/11 कमिशन ने एफबीआई और सीआईए के कामकाज की व्यापक समीक्षा की और इस बात पर भी गौर किया कि इनसे आखिर कहां चूक हुई। दो वर्षों की गहन छानबीन और विचार-विमर्श के बाद कमिशन ने अमेरिका की भावी सुरक्षा का एक रोडमैप तैयार किया। बाहरी मोर्चे पर बुश प्रशासन ने तालिबान और अफगानिस्तान के खिलाफ कार्रवाई पर फोकस किया और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति भी प्राप्त की।
भारत के नजरिए से देखें तो तालिबान के खिलाफ अमेरिका की त्वरित और आक्रामक कार्रवाई और काबुल में सत्ता परिवर्तन हमारे लिए लाभदायक रहा। हालांकि तब कौन सोच सकता था कि दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर आतंकवादी हमला हो सकता है। इसके बाद जो हुआ उसे एक बड़ा अमेरिकी ब्लंडर ही कहा जा सकता है- आतंक के विरुद्ध युद्ध में 2003 में अफगानिस्तान से इराक की ओर शिफ्ट। राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर तीन गंभीर अपराधों के आरोप लगाए गए थे। डब्ल्यूएमडी पाने का प्रयास, न्यूक्लियर वैपन, आतंकवाद का समर्थन, धार्मिक कट्टरतावाद और ऐसा निरंकुश शासन चलाना जो अपने ही लोगों को दबा भी रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र को खुद इसके प्रमाण दिए थे जिन्हें यूएस सेक्रेटरी जनरल कोलिन पावेल ने जुटाया था। हालांकि बाद में उन्होंने माना कि ये न सिर्फ कम प्रामाणिक आधारों पर तैयार किए गए थे, बल्कि कुछ तो निराधार थे।
विरोधाभासी ढंग से अमेरिका ने गलत देश का चुनाव कर लिया। इराक से कहीं ज्यादा इस तरह का देश पाकिस्तान था, जो आतंकी संगठनों और धार्मिक कट्टरता को खतरनाक तरीके से मदद कर रहा था। इस प्रक्रिया में अमेरिका ने अपनी विश्वसनीयता तो खोई ही, उसके बाद संदिग्ध आतंकियों के प्रति क्रूर रवैये ने उसकी साख और गिराई। इराक युद्ध तो एक तरह से अमेरिकी पकड़ से बाहर ही निकलता नजर आ रहा था। इससे भी खराब यह हो रहा था कि वाइट हाउस के रवैये के कारण इराक की शिया बहुल जनता ईरान के करीब हो रही थी। इराक की वस्तुस्थिति को समझने के लिए लगाए गए गलत अनुमान ही नहीं, बुश प्रशासन की नीतियां भी इराक में पैदा हुई स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं।
वर्ष 2009 की शुरुआत में वाइट हाउस में बुश-ओबामा के बीच सत्ता परिवर्तन के दौर में अमेरिका ने आतंक के खिलाफ जंग की भारी कीमत चुकाई। वैसे तो इस साल मई में ओसामा बिन लादेन का नाटकीय अंत उसके लिए एक बड़ी जीत मानी जा सकती है पर यह विजय उसे काफी महंगी पड़ी है। अक्टूबर 2001 में शुरू की गई इस जंग में हाल तक 6099 अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। अगर इसमें इराकियों, अफगानियों और पाकिस्तानियों की मौत के आंकड़े को भी शामिल किया जाए, तो यह संख्या 2 लाख 25 हजार से 2 लाख 58 हजार के बीच ठहरती है। आर्थिक नजरिए से देखें तो इसमें अमेरिका के करीब 4 खरब डॉलर खर्च हुए हैं।
कर्ज में ऊभ-चूभ
यह अकेला नुकसान नहीं है। इस साल के मध्य में अमेरिका की आर्थिक शक्ति भी डगमगा गई। क्रेडिट रेटिंग में की गई कटौती ने उसकी आर्थिक साख को काफी क्षति पहुंचाई है। 3 अगस्त 2011 को अमेरिका पर कुछ 14.7 खरब डॉलर का कर्ज था। इसे यदि उसके जीडीपी (जून, 2011 को यह 15.003 खरब डॉलर थी) के बरक्स देखें, तो यह उसका 98 प्रतिशत ठहरता है। संक्षेप में कहें तो अमेरिका अब महसूस करने लगा है कि अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं और आतंकवाद के खिलाफ अपनी जंग की वह कितनी बड़ी कीमत चुका रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इनकी वजह से इन दस वर्षों में उसने क्या पाया और क्या खोया है।

समझौते पर नजर


भारतीय प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा दो जाहिर वजहों- ममता बनर्जी की अनुपस्थिति और दिल्ली बम विस्फोट- के चलते अपेक्षित चर्चा हासिल नहीं कर पाई। लेकिन इसके आधार पर यात्रा को विफल करार देना गलत होगा। बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते कई वजहों से इधर बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। डॉ. मनमोहन सिंह की इस पहल से हालात न सिर्फ बेकाबू होने से बच सकते हैं, बल्कि यहां से दक्षिण एशिया के भविष्य की एक अच्छी रूपरेखा भी तैयार हो सकती है। भावनात्मक मुद्दों को छोड़कर सिर्फ व्यापार पर ध्यान दें तो बांग्लादेश फिलहाल भारत से 4 अरब डॉलर का माल खरीदता है, लेकिन इसको बेचता सिर्फ 40 करोड़ डॉलर का है। भारत के लिए यह सौदा फायदे का है, लेकिन बांग्लादेश में भारत विरोध की सांप्रदायिक राजनीति करने वालों के लिए इससे अच्छा मुद्दा और कोई नहीं हो सकता।
अपनी अगियाबैताल तकरीरों में वे लोगों को बताते हैं कि ढाका-मुर्शिदाबाद के कारीगरों को पहले अंग्रेजों ने बर्बाद किया और अब एक साजिश के तहत अपना माल ठेलकर हिंदुस्तानी उन्हें तबाह करने पर तुले हैं। व्यापारिक असंतुलन को दूर करने के लिए इस बार हुए समझौते में 46 किस्म के बांग्लादेशी कपड़ों के आयात को पूरी तरह करमुक्त बनाने की व्यवस्था की गई है। ऐसे बहुत सारे कदम मिलकर न सिर्फ दोनों देशों के बीच मौजूद व्यापारिक अविश्वास को दूर करेंगे बल्कि दक्षिण एशिया के दूसरे छोर, पाकिस्तान में मुद्दतों से जारी इस दुष्प्रचार की धार भी कुंद करेंगे कि भारत के लिए व्यापार के दरवाजे खोलना वहां के उद्योग-धंधों को मौत की सजा सुनाने जैसा है।
मनमोहन सिंह की बांग्लादेश यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि दोनों देशों की ढाई हजार मील लंबी सीमा को पक्का-पोढ़ा रूप देने को लेकर बनी सैद्धांतिक सहमति है। अभी हालत यह है कि कई जगहों पर सीमा रेखा को लेकर धुंधलका बना हुआ है और अवैध घुसपैठ रोकने की कोशिश में सीमा पर बाड़ लगाने की भारतीय पहल दोनों देशों के बीच हिंसक विवाद का विषय बनती रही है। यात्रा से ठीक पहले ममता बनर्जी का बांग्लादेश जाने से मना कर देना और इसके चलते दोनों देशों के बीच जल-बंटवारा समझौता न हो पाना बांग्लादेश से ज्यादा भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। इसकी प्रतिक्रिया में बांग्लादेश ने भारत द्वारा अपने दक्षिणी बंदरगाहों के इस्तेमाल का तैयारशुदा समझौता बक्से में बंद कर दिया और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए सीधे निर्यात के दरवाजे खुलते-खुलते रह गए।

संतुलन साधना जरूरी



सरकार ने तत्परता दिखाते हुए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुर्नस्थापन विधेयक, 2011 को संसद में पेश कर दिया है। वह इसे जल्द से जल्द से पास करना चाहती है ताकि यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इसका फायदा उठा सके। लेकिन भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील मसले पर हड़बड़ी में फैसला लेना ठीक नहीं होगा। सरकार को विधेयक के प्रस्तावित मसौदे में संशोधन करना पड़ा है। मसौदे में अधिग्रहित भूमि के लिए बाजार मूल्य के छह गुना मुआवजे का प्रावधान था, पर इसे कम करके चार गुना कर दिया गया क्योंकि इससे परियोजनाओं पर खर्च बढ़ जाएगा और आर्थिक विकास में दिक्कतें आएंगी। हालांकि इसमें यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकार चाहें तो मुआवजे की राशि बढ़ा दें। इस तरह के कई और बिंदु हैं जिन पर विवाद की गुंजाइश है।

बेहतर होता कि सरकार इस पर जनता के बीच और चर्चा होने देती। विभिन्न मंचों और स्त्रोतों से आने वाले विचारों के बीच से कोई एक बेहतर रास्ता निकल सकता था। अभी तो स्थिति यह है कि बिल्डरों, उद्योग संगठनों से लेकर किसानों-मजदूरों के बीच काम करने वाली सामाजिक संस्थाएं तक इस पर ऐतराज जता रही हैं। कई स्वयंसेवी संगठनों का कहना है कि इसमें सूखाग्रस्त क्षेत्र के किसानों के हितों की उपेक्षा की गई है, उन खेतिहर मजदूरों का कोई ख्याल नहीं रखा गया है जो खेती योग्य भूमि के अधिग्रहण से बेकार हो जाएंगे। इसमें पुनर्वास की बात तो की गई है पर उसके लिए कोई संतोषजनक व्यवस्था नहीं की गई है।

उद्योग जगत का कहना है कि बहुफसली भूमि के अधिग्रहण में दी गई रियायत पर्याप्त नहीं है। कई डिवेलपर्स मानते हैं कि आज के बाजार मूल्य से चार गुना अधिक कीमत देकर जमीन लेना और उस पर सस्ते मकान बनाना उनके लिए संभव नहीं है। बड़े हाउसिंग प्रॉजेक्ट लाना भी अब आसान नहीं रह जाएगा, मगर उन्हें सबसे ज्यादा आपत्ति उस प्रावधान पर है, जिसमें डिवेलपर्स द्वारा अधिग्रहीत भूमि पर पुनर्वास अनिवार्य कर दिया गया है। बहरहाल, इतनी सारी आपत्तियों को देखते हुए सबसे बड़ी चुनौती है इसमें संतुलन बनाना।

विकास प्रक्रिया में शहरों पर जनसंख्या का दबाव तेजी से बढ़ रहा है। शहरों के फैलाव की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए जमीन की जरूरत तो पड़ेगी ही। फिर उद्योग-धंधों और नई कारोबारी गतिविधियों के लिए भी भूमि चाहिए। लेकिन किसानों और खेती से जुड़े विभिन्न तबकों के हितों की रक्षा भी होनी चाहिए। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में जमीन का ढांचा या किसानों की स्थिति एक जैसी नहीं है। किसी एक या दो राज्य के मॉडल को सामने रखकर इतनी महत्वपूर्ण नीति नहीं बनाई जा सकती। आशा की जानी चाहिए कि इस विधेयक पर विचार करते हुए संसद की स्थायी समिति इन बातों का ध्यान रखेगी।

Wednesday, September 7, 2011

तीन झूठ: कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी

तीन झूठ:* ** कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं , वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में जाहिर की थी। ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था , जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है , जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है। सोनिया ने इसी तरह अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे वल्र्ड वार के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं , जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था , सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे। लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था , ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता। तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी , जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है , जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। ये सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। इस तरह ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं , जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की। कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को बेवकूफ बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया। इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की जरूरत है । See Video : http://www.youtube.com/watch?v=SFMy44L9w28 *सोनिया का भारत में पदार्पण:* सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये। राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे , लेकिन वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। स्वाभावित तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें। राजीव मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर मेरे सामने भी 1965 में तब मेरे सामने भी गुस्सा जाहिर किया था जब मैं हार्वर्ड में इकोनामिक्स का प्रोफेसर था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुझे ब्रेंनेडिस यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में , जहां वो ठहरी थीं, व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया। पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था , जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और खासा पैसा उड़ा रहे थे और कर्ज में डूबे हुए थे। उन दिनों सोनिया के मित्रों में केवल राजीव गांधी ही नहीं थे बल्कि माधवराव सिंधिया भी थे। सिंधिया और एक स्टीगलर नाम का जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्रों में थे। माधवराव की सोनिया से दोस्ती राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही। 1972 में माधवराव आईआईटी दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उसमें उन्हें बुरी तरह चोटें आईं , ये रात दो बजे की बात है , उसी समय आईआईटी का एक छात्र बाहर था। उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की दरकार थी। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया। दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं। *बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ नजदीकी मित्रों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था। कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान हादसे में मारे गये। मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी उसी विमान से जाने वाले थे लेकिन उन्हें आखिरी क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया। *वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं , उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया , उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में बेहतर कदम साबित हो सकती है। कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा। *सोनिया के केजीबी कनेक्शन:* ** बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा। जब एक प्रधानमंत्री का पुत्र लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था , केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की खासा परवाह करती थी , ने अपनी नजर इस पर लगा दी , ये स्वाभाविक भी था , तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की बेटी है , जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्र है। इस तरह केजीबी ने इस शादी को हरी झंडी दे दी। इससे पता चलता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था। राजीव और सोनिया के रिश्ते सोवियत संघ के हित में भी थे , इसलिए उन्होंने इस पर काम भी किया। राजीव की शादी के बाद मैनो परिवार को सोवियत रिश्तों से खासा फायदा भी हुआ। भारत के साथ सभी तरह सोवियत सौदों , जिसमें रक्षा सौदे भी शामिल थे , से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही। एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे , जो बाद में सोनिया के नाम हो गये। डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्नलिस्ट हैं और वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं। उन्होंने तमाम केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं , जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं। उन्होंने अपनी किताब द स्टेट विदइन स्टेट – केजीबी इन द सोवियत यूनियन में उन्होंने इस तरह की गोपनीय बातों के रिफरेंसनंबर तक दे दिये हैं , जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्रेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है। रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब जाहिर करने पर भिङत भी हुई। उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की। (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी)। प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये जरूरी थे। इन भुगतानों में कुछ हिस्सा मैनो परिवार के पास गया , जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की। 1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चीजें श्रीमती सोनिया गांधी के लिए बदल गईं। उनका संरक्षक देश 16 देशों में बंट गया। अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था और अव्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के करीब हो गईं , जो रूस का विरोधी है। रूस के मौजूदा प्रधानमंत्री और इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे। जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को तैनात किया , जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था। इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में बेहतर तरीके से जानता था। वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था। नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके जरिए आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती। क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वर्ष 2001 में मैंने दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की , जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें मैंने सीबीआई जांच की मांग की थी लेकिन वाजपेई सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे पहले सीबीआई महकमे को देखने वाली गृह राज्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्र पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था लेकिन इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्रवाई रोक दी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेई ने वसुधरा की जांच के आदेश को खारिज कर दिया। मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि वो रूस से मालूम करे कि सत्यता क्या है , रुसियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सवाल ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था। वाजपेई सरकार ने , लेकिन क्यों ? इसकी भी एक कहानी है। अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग खत्म सी हो चुकी है *सोनिया और भारत के कानूनों का हनन :* सोनिया के राजीव से शादी के बाद वह और उनकी इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्रोची से मदद मिली। देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में गरीबी से उठकर बिलियोनायर हो गया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसे छोड़ा गया। 19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पब्लिक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्री हाउस के पते पर और उसके जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं। जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था) । संसद में हंगामा हो गया। कुछ दिनों बाद एक लिखित जवाब में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था लेकिन अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से इस्तीफा दे दिया है। जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का। ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था। इस आधार पर उनका वीसा भी रद्द किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं। जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया। लेकिन जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से खुद को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था। *सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव :* मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं। अगर कभी उन्हें किसी मामले में गलत पाया गया या कठघरे में खडा किया गया तो वो हमेशा इटली भाग सकती हैं। पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो खुद को पेरू में पैदा हुआ बताते थे , जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान भाग गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया। 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को हराया और नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक की इस मौके पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया। ये बात अब कोई नई नहीं है बल्कि कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है। राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे। लेकिन वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये। ये था सोनिया का उन पर प्रभाव। राजीव 197८ में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे लेकिन जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी। जो लोग राजीव के करीबी हैं , वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के बाद सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे। उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और 197८ के चुनावों में हार के लिए सोनिया को जिम्मेदार माना था। मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के करीबी लोग राजीव से घृणा करते थे। इस बात का जवाब है कि राजीव के हत्यारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई। ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया या धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया ? वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं , जैसा मुहम्मद गौरी , नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था। ये कोई सीक्रेट नहीं रह गया है। लेकिन सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं। वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं। जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्रेट के क्रेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली या चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो। सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था। इसमें एंटिक के सामान , बहुमूल्य मूर्तियां , शॉल्स , आभूषण , पेंटिंग्स , सिक्के और भी न जाने कितनी ही बहुमूल्य सामान होते थे। ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था। लेकिन यहां उनकी बिक्री ज्यादा नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रिस्टी के जरिए बेचा जाने लगा। इस कमाई का एक हिस्सा राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया। लेकिन ज्यादातर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है। राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक साल की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी। मैं वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताता रहा लेकिन उन्हें विश्वास में नहीं ले सका , तब मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की मदद लेकर जांच करने को कहा। इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी , जिसे कोर्ट ने सीबीआई से मुझे दिखाने को भी कहा , लेकिन सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया। सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक आदमी का बताया और विया बेलिनी 14 , ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था। अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद जाहिर करना था लेकिन उसे नई सरकार द्वारा एडिशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया। *स्वामी ने सोनिया को लपेटा :* ** जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने अब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जद में कांग्रेस व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी ले आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रुपए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग हिस्सेदार थे। इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का हिस्सा 30-30 प्रतिशत है। 10 जनपथ को घोटाले का केंद्र बिंदु बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे। स्पेक्ट्रम मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई से पहले अपने घर आराम करने देहरादून पहुंचे स्वामी ने पत्रकार वार्ता के दौरान २जी मामले में कांग्रेस नेतृत्व पर कई आरोप लगा स्वामी ने दावा किया इस घोटाले में घूस के तौर पर बांटे गए 60 हजार करोड़ रुपये का दस प्रतिशत हिस्सा पूर्व संचार मंत्री ए राजा को गया। 30 फीसदी हिस्सेदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को और 30-30 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्काको गया है। हालांकि इसके कोई दस्तावेजी सबूत उन्होंने उपलब्ध नहीं कराए। स्वामी ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि अमेरिका से स्पेक्ट्रम मामले में हुए लेनदेन का रिकार्ड भी मंगाया जाए। साथ ही उन्होंने पूर्व मंत्री ए राजा की सुरक्षा की मांग भी प्रधानमंत्री से की है। उनका कहना था कि ए राजा की सबसे अच्छी सुरक्षा तभी हो सकती है जब वो जेल में हों या फिर उन्हें हाउस अरेस्ट किया जाए। स्वामी ने राजा की सुरक्षा को लेकर लिखी चिठ्ठी के जवाब में प्रधानमंत्री की ओर से आए पत्र को भी सार्वजनिक किया। इस पत्र में कहा गया है कि ए राजा को उचच स्तरीय सुरक्षा दी जा रही है और स्पेक्ट्रम डील के बैंक रिकॉर्ड की जानकारी के लिए अमेरिका सरकार से कहा जा रहा है। ए राजा की चिंता की वजह पूछे जाने पर स्वामी ने कहा कि इस महाघोटाले की सारी जानकारी राजा के पास है। इस मामले में अरब देशों के अंडरवर्ल्ड के लोग भी शामिल हैं। राजा की हत्या कर वे सबूत मिटाना चाहेंगे।