भरत झुनझुनवाला॥
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सीरंगराजन ने कहा है कि सरकारी खर्चों के ' प्लान ' एवं 'नॉन - प्लान ' के वर्गीकरण को समाप्त किया जाये। कईप्लान अथवा पूंजी खर्च अनुत्पादक होते हैं जैसे बीमारसार्वजनिक इकाइयों की इक्विटी में निवेश करना अथवाडाक्टरों के अभाव के बावजूद प्राइमरी हेल्थ सेंटर बनाना।दूसरी ओर कई नॉन - प्लान अथवा राजस्व खर्च उत्पादकहोते हैं जैसे पुलिस द्वारा कानून व्यवस्था ठीक होने सेविकास स्वयं हो जाता है। आयोग चाहता है कि ' प्लान 'एवं ' नॉन - प्लान ' के कृत्रिम विभाजन को समाप्त करदिया जाये लेकिन पूंजी एवं राजस्व खर्च के विभाजन कोबनाए रखा जाये।
भारी - भरकम सरकार
आयोग की सोच की मूल दिशा सही है किंतु पूंजी एवं राजस्व खर्च के विभाजन को बनाए रखने से मूल विसंगतिबनी रहेगी। प्रतीत होता है कि आयोग का अनकहा उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को पोषित करने की पालिसी परआधा - अधूरा पर्दा डालना है। भारत सरकार का जनहित हासिल करने का पुराना नुस्खा है - हर काम के लिएसरकारी नौकरों की फौज बनाओ। इससे सरकार का आकार बड़ा होता जाएगा और जनता पर शासन करनाआसान होगा। पचास के दशक में यह कार्य कम्युनिटी डिवेलपमेंट के झंडे तले हुआ। अस्सी के दशक में इंदिरागांधी ने गरीबी हटाओ के नाम पर अनेक योजनायें शुरू की। अब शिक्षा , स्वास्थ्य एवं रोजगार गारंटी के नाम परसरकारी कर्मचारियों को पोषित किया जा रहा है।
रोजगार के बदले राहत
इन मदों से जनता को लाभ होना संदिग्ध है किंतु सरकारी कर्मचारियों को लाभ होना निश्चित है। निजी टीचरोंकी तुलना में सरकारी अध्यापक चार गुना वेतन पाते हैं और उनका आधा रिजल्ट देते हैं। सरकारी अस्पतालों मेंमरीज अपने पैसों से दवा खरीद कर लाते हैं और उनके लिये सप्लाई की गयी दवाएं ब्लैक की जाती हैं। रोजगारगारंटी योजना के अंतर्गत प्रधानों द्वारा 30 से 50 फीसदी कमीशन सरकारी अधिकारियों को दिया जा रहा है। इसकार्यक्रम के माध्यम से सरकार जनता को मुफ्तखोर और अपंग बना रही है। जनता भ्रम में रहती है कि उसके बच्चेको मुफ्त शिक्षा मिल रही है जबकि बच्चे को घटिया शिक्षा देकर आजीवन गरीब बनाये रखा जाता है।
गांधीजी ने कहा था कि नंगे को कपड़े नहीं स्वरोजगार दीजिये। परंतु कल्याणकारी कर्मचारियों के सरदारों को यहनागवार लगता है। यह दुराग्रह चलता रहे और इन खर्चों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहे इसलिये अब ' नॉन - प्लान 'के वर्गीकरण को समाप्त किया जा रहा है। इन खर्चों की राजस्व में गिनती होती रहेगी परंतु एक कांटा निकलजाएगा। मेरा तर्क यह नहीं है कि प्लान एवं नॉन - प्लान के वर्गीकरण को बनाये रखा जाये। यह वर्गीकरण सही मेंअप्रासंगिक है। परंतु खर्चों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जाना चाहिये कि सच्चे और झूठे खर्चों का स्पष्ट भेद होजाये। जरूरत इस बात की है कि सरकारी कर्मचारियों को पोसने के स्थान पर जनता को पोसा जाये।
एनडीए के कार्यकाल में विजय केलकर की अध्यक्षता में वित्तीय घाटा नियंत्रित करने के संबंध में एक कमिटीबनायी गयी थी। उसका सुझाव था कि सरकारी खर्चों को प्लान एवं नॉन - प्लान के स्थान पर सार्वजनिक एवंनिजी सेवाओं में वर्गीकृत किया जाना चाहिये। सार्वजनिक सेवायें वे हैं जिन्हें व्यक्ति बाजार से नहीं खरीद सकताऔर जिन्हें केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है जैसे - नहर , सड़क , टेलीफोन , बिजली , कानून , न्याय ,रक्षा , मुद्रा , मलेरिया का छिड़काव , शिक्षा के लिये पाठ्यक्रम तय करना , परीक्षा लेना , प्रमाणपत्र जारी करनाइत्यादि। इस प्रकार की सार्वजनिक सुविधाओं पर सरकारी खर्च का सुप्रभाव प्रमाणित है। उदाहरण के लिये श्री केएन रेड्डी ने नब्बे के दशक में एक अध्ययन में पाया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सरकारी अस्पतालों में उपचारपर किये गये खर्च की तुलना में जन शिक्षा , रिसर्च , लैबोरेटरी और संक्रामक रोगों से बचाव इत्यादि पर कियेगये खर्च से जन स्वास्थ्य में कहीं ज्यादा लाभ हुआ है।
योजना आयोग द्वारा प्लान - नॉन प्लान खर्चों के वर्गीकरण को समाप्त करने की पहल सही दिशा में है। परंतु इसेसमाप्त करके सरकारी खर्चों को पूंजी एवं राजस्व खर्च के उतने ही अप्रासंगिक वर्गों में नहीं बांटना चाहिये। इसकेबजाय खर्चों को केलकर के सुझाव के अनुरूप ' सार्वजनिक सुविधाओं ' और ' निजी सुविधाओं ' के वर्गों में बांटनाचाहिये। सरकार की पहली जिम्मेदारी उन सुविधाओं को सुचारु रूप से उपलब्ध कराना है , जिन्हें जनता स्वयंहासिल नहीं कर सकती है। हमें प्रतिदिन बताया जा रहा है कि बुनियादी संरचना में अमुक हजार करोड़ रुपयेनिवेश की जरूरत है। यदि सरकार इस निवेश को अंजाम दे तो रोजगार स्वयं ही उत्पन्न हो जायेंगे। कानून -व्यवस्था सही होने से बिहार के लोगों ने जमीन परती छोड़ने के स्थान पर सब्जी इत्यादि उगाना शुरू कर दियाहै। यही बात गांधीजी ने कही थी। परंतु कल्याणकारी माफिया के सरदारों को यह नुस्खा पसंद नहीं आता है। यदिमलेरिया के लिये तालाब पर छिड़काव हो गया तो ग्रामीणों का स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा। ऐसा हुआ तो सरकारीडॉक्टरों की नियुक्ति का आधार ही नहीं रह जायेगा। यदि परीक्षा व्यवस्था ठीक हो गयी तो न पढ़ाने वाले सरकारीटीचरों का भंडाफोड़ हो जायेगा।
कुनबे का हित
सी रंगराजन , मनमोहन सिंह और मोंटेक अहलूवालिया सभी मूल रूप से सरकारी नौकर रहे हैं। अपने कुनबे काहित उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस दुराग्रह को पूरा करने के लिये नुस्खा यह निकाला गया है कि तालाब परछिड़काव एवं परीक्षा में सुधार कम करो और सरकारी डॉक्टरों एवं टीचरों की नियुक्ति अधिक करो। इसीलियेकहा जा रहा है कि प्लान - नॉन प्लान का वर्गीकरण समाप्त कर दो। गांव में सड़क और सिंचाई कमजोर बनायेरखो , जिससे ग्रामीण स्व - रोजगार न कर सकें। फिर उनकी गरीबी दूर करने के लिये सरकारी शिक्षकों औरस्वास्थ्य कर्मियों की फौज खड़ी कर लो और रोजगार गारंटी योजना में कमीशन वसूलने का रास्ता खोल दो।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सीरंगराजन ने कहा है कि सरकारी खर्चों के ' प्लान ' एवं 'नॉन - प्लान ' के वर्गीकरण को समाप्त किया जाये। कईप्लान अथवा पूंजी खर्च अनुत्पादक होते हैं जैसे बीमारसार्वजनिक इकाइयों की इक्विटी में निवेश करना अथवाडाक्टरों के अभाव के बावजूद प्राइमरी हेल्थ सेंटर बनाना।दूसरी ओर कई नॉन - प्लान अथवा राजस्व खर्च उत्पादकहोते हैं जैसे पुलिस द्वारा कानून व्यवस्था ठीक होने सेविकास स्वयं हो जाता है। आयोग चाहता है कि ' प्लान 'एवं ' नॉन - प्लान ' के कृत्रिम विभाजन को समाप्त करदिया जाये लेकिन पूंजी एवं राजस्व खर्च के विभाजन कोबनाए रखा जाये।
भारी - भरकम सरकार
आयोग की सोच की मूल दिशा सही है किंतु पूंजी एवं राजस्व खर्च के विभाजन को बनाए रखने से मूल विसंगतिबनी रहेगी। प्रतीत होता है कि आयोग का अनकहा उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को पोषित करने की पालिसी परआधा - अधूरा पर्दा डालना है। भारत सरकार का जनहित हासिल करने का पुराना नुस्खा है - हर काम के लिएसरकारी नौकरों की फौज बनाओ। इससे सरकार का आकार बड़ा होता जाएगा और जनता पर शासन करनाआसान होगा। पचास के दशक में यह कार्य कम्युनिटी डिवेलपमेंट के झंडे तले हुआ। अस्सी के दशक में इंदिरागांधी ने गरीबी हटाओ के नाम पर अनेक योजनायें शुरू की। अब शिक्षा , स्वास्थ्य एवं रोजगार गारंटी के नाम परसरकारी कर्मचारियों को पोषित किया जा रहा है।
रोजगार के बदले राहत
इन मदों से जनता को लाभ होना संदिग्ध है किंतु सरकारी कर्मचारियों को लाभ होना निश्चित है। निजी टीचरोंकी तुलना में सरकारी अध्यापक चार गुना वेतन पाते हैं और उनका आधा रिजल्ट देते हैं। सरकारी अस्पतालों मेंमरीज अपने पैसों से दवा खरीद कर लाते हैं और उनके लिये सप्लाई की गयी दवाएं ब्लैक की जाती हैं। रोजगारगारंटी योजना के अंतर्गत प्रधानों द्वारा 30 से 50 फीसदी कमीशन सरकारी अधिकारियों को दिया जा रहा है। इसकार्यक्रम के माध्यम से सरकार जनता को मुफ्तखोर और अपंग बना रही है। जनता भ्रम में रहती है कि उसके बच्चेको मुफ्त शिक्षा मिल रही है जबकि बच्चे को घटिया शिक्षा देकर आजीवन गरीब बनाये रखा जाता है।
गांधीजी ने कहा था कि नंगे को कपड़े नहीं स्वरोजगार दीजिये। परंतु कल्याणकारी कर्मचारियों के सरदारों को यहनागवार लगता है। यह दुराग्रह चलता रहे और इन खर्चों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहे इसलिये अब ' नॉन - प्लान 'के वर्गीकरण को समाप्त किया जा रहा है। इन खर्चों की राजस्व में गिनती होती रहेगी परंतु एक कांटा निकलजाएगा। मेरा तर्क यह नहीं है कि प्लान एवं नॉन - प्लान के वर्गीकरण को बनाये रखा जाये। यह वर्गीकरण सही मेंअप्रासंगिक है। परंतु खर्चों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जाना चाहिये कि सच्चे और झूठे खर्चों का स्पष्ट भेद होजाये। जरूरत इस बात की है कि सरकारी कर्मचारियों को पोसने के स्थान पर जनता को पोसा जाये।
एनडीए के कार्यकाल में विजय केलकर की अध्यक्षता में वित्तीय घाटा नियंत्रित करने के संबंध में एक कमिटीबनायी गयी थी। उसका सुझाव था कि सरकारी खर्चों को प्लान एवं नॉन - प्लान के स्थान पर सार्वजनिक एवंनिजी सेवाओं में वर्गीकृत किया जाना चाहिये। सार्वजनिक सेवायें वे हैं जिन्हें व्यक्ति बाजार से नहीं खरीद सकताऔर जिन्हें केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है जैसे - नहर , सड़क , टेलीफोन , बिजली , कानून , न्याय ,रक्षा , मुद्रा , मलेरिया का छिड़काव , शिक्षा के लिये पाठ्यक्रम तय करना , परीक्षा लेना , प्रमाणपत्र जारी करनाइत्यादि। इस प्रकार की सार्वजनिक सुविधाओं पर सरकारी खर्च का सुप्रभाव प्रमाणित है। उदाहरण के लिये श्री केएन रेड्डी ने नब्बे के दशक में एक अध्ययन में पाया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सरकारी अस्पतालों में उपचारपर किये गये खर्च की तुलना में जन शिक्षा , रिसर्च , लैबोरेटरी और संक्रामक रोगों से बचाव इत्यादि पर कियेगये खर्च से जन स्वास्थ्य में कहीं ज्यादा लाभ हुआ है।
योजना आयोग द्वारा प्लान - नॉन प्लान खर्चों के वर्गीकरण को समाप्त करने की पहल सही दिशा में है। परंतु इसेसमाप्त करके सरकारी खर्चों को पूंजी एवं राजस्व खर्च के उतने ही अप्रासंगिक वर्गों में नहीं बांटना चाहिये। इसकेबजाय खर्चों को केलकर के सुझाव के अनुरूप ' सार्वजनिक सुविधाओं ' और ' निजी सुविधाओं ' के वर्गों में बांटनाचाहिये। सरकार की पहली जिम्मेदारी उन सुविधाओं को सुचारु रूप से उपलब्ध कराना है , जिन्हें जनता स्वयंहासिल नहीं कर सकती है। हमें प्रतिदिन बताया जा रहा है कि बुनियादी संरचना में अमुक हजार करोड़ रुपयेनिवेश की जरूरत है। यदि सरकार इस निवेश को अंजाम दे तो रोजगार स्वयं ही उत्पन्न हो जायेंगे। कानून -व्यवस्था सही होने से बिहार के लोगों ने जमीन परती छोड़ने के स्थान पर सब्जी इत्यादि उगाना शुरू कर दियाहै। यही बात गांधीजी ने कही थी। परंतु कल्याणकारी माफिया के सरदारों को यह नुस्खा पसंद नहीं आता है। यदिमलेरिया के लिये तालाब पर छिड़काव हो गया तो ग्रामीणों का स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा। ऐसा हुआ तो सरकारीडॉक्टरों की नियुक्ति का आधार ही नहीं रह जायेगा। यदि परीक्षा व्यवस्था ठीक हो गयी तो न पढ़ाने वाले सरकारीटीचरों का भंडाफोड़ हो जायेगा।
कुनबे का हित
सी रंगराजन , मनमोहन सिंह और मोंटेक अहलूवालिया सभी मूल रूप से सरकारी नौकर रहे हैं। अपने कुनबे काहित उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस दुराग्रह को पूरा करने के लिये नुस्खा यह निकाला गया है कि तालाब परछिड़काव एवं परीक्षा में सुधार कम करो और सरकारी डॉक्टरों एवं टीचरों की नियुक्ति अधिक करो। इसीलियेकहा जा रहा है कि प्लान - नॉन प्लान का वर्गीकरण समाप्त कर दो। गांव में सड़क और सिंचाई कमजोर बनायेरखो , जिससे ग्रामीण स्व - रोजगार न कर सकें। फिर उनकी गरीबी दूर करने के लिये सरकारी शिक्षकों औरस्वास्थ्य कर्मियों की फौज खड़ी कर लो और रोजगार गारंटी योजना में कमीशन वसूलने का रास्ता खोल दो।
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