Thursday, September 22, 2011

काम का तरीका बदलें



हमारे देश के कुछ हिस्सों में न्यूक्लियर प्लांटों केखिलाफ चल रहे प्रदर्शनों को देख कर आशंका हो रही हैकि कहीं पॉप्युलिज्म के चक्कर में देश के परमाणु कार्यक्रमको ही ग्रहण न लग जाए। फिलहाल महाराष्ट्र के जैतापुर ,पश्चिम बंगाल के हरिपुर और तमिलनाडु के कुडनकुलमपरमाणु संयंत्रों को लेकर विरोध हो रहा है। 

सबसे ताजा मामला कुडनकुलम का है , जिसका कामरोकने के लिए तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता नेप्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और जवाब में प्रधानमंत्री नेवी . नारायणसामी को प्रदर्शनकारियों से बातचीत करनेके लिए तमिलनाडु भेजा। पर्यावरणवादियों औरसामाजिक कार्यकर्ताओं का एक तबका काफी पहले सेपरमाणु संयंत्रों पर सवाल उठाता रहा है। जापान कीफुकुशिमा दुर्घटना के बाद उनकी सक्रियता और बढ़ गई है।उन्होंने परमाणु संयंत्रों के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया है। वे संयंत्रों के बारे में एकतरफा बातें कर रहे हैं, जिससे लोगों का भय और बढ़ रहा है। उनके प्रभाव में राजनेता भी आने लगे हैं। जैसे ममता बनर्जी ने साफ तौरपर कह दिया कि वे हरिपुर में प्रस्तावित न्यूक्लियर प्लांट नहीं लगने देंगी। जयललिता ने भी कुडनकुलम प्लांटकी समस्याओं की गहराई में गए बगैर काम रोकने की बात कह दी , जबकि इसकी आठ में से दो यूनिटें बनकरतैयार हो चुकी हैं और उनमें जल्दी ही उत्पादन भी शुरू होने वाला है। 

वर्ष 2050 तक हम विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होंगे , तब हमें आज से दस गुनी ऊर्जा की जरूरतहोगी। ऊर्जा के हमारे पारंपरिक स्रोत अब दम तोड़ रहे हैं। अगर बिजली बनाने के लिए आज से हम केवल कोयलेका ही इस्तेमाल करें तो इसका भंडार एक दशक में समाप्त हो जाएगा। कमोबेश यही हाल तेल और गैस का भी है।ऐसे में परमाणु बिजली ही एकमात्र विकल्प है। हां , इसमें कोई दो राय नहीं है कि परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा कोलेकर हमें हर संभव व्यवस्था करनी होंगी। केंद्र सरकार वह सुनिश्चित कर रही है। लेकिन उसका दायित्व सिर्फपरमाणु समझौता कर लेना और उसके संयंत्रों का निर्माण शुरू कर देना भर नहीं है। 

हम अपने सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की इस राय से सहमत नहीं हैं कि सरकार को भय फैलाने वालेशरारती तत्वों की उपेक्षा करनी चाहिए और संयंत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सख्ती से उसका क्रियान्वयनकराना चाहिए। हमारी राय यह है कि इन विरोध प्रदर्शनों से सबक लेते हुए सरकारी एजेंसियों को अपने काम कातरीका बदलना चाहिए। लोकतंत्र में ऐसी संवेदनशील परियोजनाएं शुरू करने से पहले स्थानीय नागरिकों कोविश्वास में लेना जरूरी है। यदि सरकारी एजेंसियां लोगों से पहले से संवाद करें और उन्हें जरूरी जानकारी देतीरहें , तो न गलतफहमी फैलेगी , न शरारती तत्वों को ऐसा करने का मौका मिलेगा। 

आज की तारीख में हर परियोजना के साथ एक सी समस्या नहीं है , कहीं पुनर्वास का मामला है तो कहीं रोजगारका। अगर पहले ही जमीनी स्थितियों का विश्लेषण किया गया होता तो किसी को विरोध करने का अवसर ही नहींमिलता।

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