लगता है , भारतीय हॉकी के सुनहरे दिन लौटने वाले हैं। एशियन चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में अपने चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को हराकर एकदम नए खिलाड़ियों से सजी हमारी टीम ने यह साबित कर दिया है कि अब उसे हल्के में लेना किसी को भी भारी पड़ सकता है।
इस खिताबी जीत से भारतीय हॉकी में नया जोश तो पैदा ही होगा , साथ में हमारी टीम के प्रति दुनिया का नजरिया भी बदलेगा। अभी हाल तक भारतीय हॉकी टीम में वैसे तेवर नजर नहीं आ रहे थे कि उससे किसी बड़ी जीत की उम्मीद की जाती।
पिछली कई हारों के जख्म ताजा थे , उस पर कई सीनियर खिलाड़ी भी टीम से नदारद थे। शिवेंद्र सिंह , तुषार खांडेकर और अर्जुन हलप्पा जैसे धुरंधर चोट की वजह से टूर्नामेंट में खेलने नहीं जा सके थे। इससे भी बड़ी मुश्किल तब खड़ी हुई जब अभ्यास कैंप को बीच में ही छोड़ देने के कारण ऑलराउंडर सरदार सिंह और ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह पर बैन लगा दिया गया।
ऐसे में एकदम नए और तकरीबन अनुभवहीन खिलाडि़यों वाली इस टीम का खिताब जीतना काबिलेतारीफ ही कहा जाएगा। गजब यह कि भारत ने यह टूर्नामेंट बिना कोई मैच गंवाए जीता है। फाइनल मैच में फैसला बेशक टाईब्रेकर के जरिए हुआ पर वहां हमारे नवोदित खिलाडि़यों ने जैसा संयम दिखाया , उससे वे शाबासी के हकदार बनते हैं।
ऐसे नाजुक मौकों पर तो अनुभवी खिलाड़ियों का भी पसीना छूट जाता है और वे गलती कर बैठते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि नए विदेशी कोच ऑस्ट्रेलिया के माइकल नॉब्स का मार्गदर्शन टीम के लिए फायदेमंद रहा।
टीम ने खिताब जीत कर साबित कर दिया है कि नॉब्स सही रास्ते पर हैं। असल में शैली के मामले में भारतीय हॉकी ऑस्ट्रेलियाई हॉकी के काफी करीब है। भारतीय खिलाड़ी ताकतवर यूरोपीय खिलाडि़यों पर अपने कौशल के बल पर ही भारी पड़ते हैं। यूरोपीय टीमों को चुनौती देनी है तो हमें अपनी कलाकारी पर ज्यादा भरोसा करना होगा।
इसी से हम दुनिया में अपनी हॉकी का लोहा मनवा सकते हैं। बतौर कोच पहले ही टूर्नामेंट में भारत को चैंपियन बनवाने में योगदान करने वाले नॉब्स भारतीय खिलाड़ियों की इस ताकत को परखने और उसका इस्तेमाल करने में सफल रहे हैं। अगले टूर्नामेंटों में वह टीम से जुड़ी तमाम जानकारियों का इस्तेमाल करते हुए खिलाड़ियों को उनकी विशेषताओं के मुताबिक जिम्मेदारी सौंप सकते हैं।
इसके समानांतर एक बड़ा काम और करने की जरूरत है। वह है देश के भीतर हॉकी को उसका खोया गौरव वापस दिलाना। चैंपियंस ट्रॉफी जैसी जीत देश में हॉकी को उसका कुछ सम्मान तो वापस दिलाएगी , पर हॉकी के मामले में ' चक दे इंडिया ' जैसा जोश जगाने के लिए अभी और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
हॉकी खिलाड़ियों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के साथ-साथ उनके चयन और उनकी ट्रेनिंग का स्तर सुधार कर ही तस्वीर कुछ उजली की जा सकती है।
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