Sunday, September 11, 2011

बिहार स्पेशल कोर्ट ऐक्ट


भ्रष्टाचार दूर करने के बारे में बातें तो सब करते रहे हैं, लेकिन आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करने का माद्दा कम ही नजर आता है। बहरहाल, इधर भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही तेज हवा ने अपना कारगर असर दिखाना शुरू कर दिया है और इस मामले में बाजी मारी है बिहार ने।
बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट 2009 के तहत सबसे पहले आईएएस शिव शंकर वर्मा को दंडित किया गया है। उन पर 1.44 करोड़ की अघोषित संपत्ति रखने का केस इस एक्ट के तहत चलाया गया था। पटना हाई कोर्ट के निर्देशानुसार उनका तीन मंजिला मकान जब्त कर लिया गया और उसे मानव संसाधन विभाग को सौंप दिया गया।
अब इस इमारत में एक स्कूल चलाया जा रहा है। यही नहीं, इस किस्म के फिलहाल 17 केस बिहार में अभी और चल रहे हैं। बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 और बिहार स्पेशल कोर्ट रूल्स, 2010 के खिलाफ कई बड़े अधिकारियों द्वारा पटना हाई कोर्ट में काफी पहले याचिका दायर की जा चुकी है।
याचिका दायर करने वालों में राज्य के पूर्व डीजीपी नारायण मिश्रा भी शामिल रहे हैं। इस याचिका में उन प्रावधानों को चैलेंज किया गया था जो राज्य सरकार को अधिकारियों की अघोषित संपत्ति जब्त करने का अधिकार देते हैं। अफसरों की यह कोशिश अब तक रंग नहीं लाई है, इससे लगता है कि बिहार में भ्रष्ट अफसरों की खैर नहीं है।
भ्रष्टाचार से जुड़े इनके केसों की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का निर्णय कर राज्य सरकार ने जनता की पुरानी ख्वाहिश को व्यावहारिक रूप दे दिया है। स्पेशल कोर्ट एक्ट को केंद्र सरकार की मंजूरी तब मिली थी जब स्टेट एसेंबली में यह तय कर लिया गया कि जो अधिकारी अपनी आय से अधिक अप्रमाणित संपत्ति रखेंगे, उनकी संपत्ति को राज्य सरकार जब्त कर सकती है।
इस एक्ट के तहत वही पब्लिक सर्वेंट अर्थात अधिकारी आएंगे जो अपना वेतन राज्य सरकार के खजाने से पाते हों। देखने वाली बात यह है कि क्या देश के अन्य राज्यों की सरकारें भी बिहार का अनुसरण करने की कोशिश करेंगी? अगर वे ऐसा करती हैं तो इससे दो लाभ होंगे। एक तो यह कि लोग भ्रष्टाचार से अर्जित अचल संपत्ति के सार्वजनिक इस्तेमाल को देख खुश होंगे।
दूसरे, अन्य भ्रष्ट अधिकारियों के लिए यह एक सबक का काम भी करेगा। आज के दौर के लिए यह सबक सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि भ्रष्टाचार ने इस देश को करीब-करीब खोखला कर दिया है। यदि इस किस्म के मामले बिहार के अलावा और जगहों पर भी इसी परिणति तक पहुंचेंगे तो स्वयं को लगभग प्रभु मानकर चलने वाले बड़े सरकारी अधिकारियों की निरंकुशता पर रोक लगेगी। साथ ही इससे ऐसा माहौल भी बनेगा जिसमें बगैर कुछ लिए-दिए भी काम हो सकने की संभावना बलवती होगी।

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