Tuesday, September 6, 2011

अपराध और राजनीति


भारतीय राजनीति को अपराध मुक्त बनाना, खासकर अपराधियों को संसद और विधानसभाओं में पहुंचने से रोकना, पिछले दो दशकों से देश के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में कानून मंत्रालय द्वारा आने वाले दिनों में इस आशय का एक विधेयक केंद्रीय कैबिनेट के विचारार्थ पेश किए जाने की सूचना उत्साहवर्धक है।
अभी इस दिशा में दो साल या उससे ज्यादा की सजा पाए व्यक्तियों को चुनाव लड़ने की सुविधा से वंचित करने का प्रावधान है, लेकिन इसके नतीजे बहुत सीमित हैं। ज्यादातर मामलों में मुकदमे साल-दर-साल चलते रहते हैं और अक्सर गवाहों के मुकर जाने से अभियुक्तों को सजा मिलने की नौबत ही नहीं आती। कई बार निचली अदालतों में दो साल से ज्यादा की सजा मिल जाने के बाद भी लोगबाग इसके चुनावी असर से बच निकलने के रास्ते निकाल लेते हैं।
मसलन, निचली अदालत में मिली सजा को अगर ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा चुकी है, तो इसे चुनाव लड़ने पर लगी रोक को खारिज करने की दलील बना दिया जाता है। इन जटिलताओं से बचने के लिए प्रस्तावित विधेयक में किसी व्यक्ति के खिलाफ चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल होने को ही उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिए जाने की शर्त बनाया गया है। राजनीति को अपराध मुक्त बनाने के लिहाज से यह उपाय पहली नजर में काफी कारगर नजर आता है। इसमें कन्फ्यूजन की गुंजाइश नहीं के बराबर है और ऐसा कानून अमल में आने की स्थिति में कम से कम स्थापित अपराधियों का चुनाव लड़ना तो मुश्किल बनाया ही जा सकता है।
लेकिन असल समस्या इस विधेयक के कानून की शक्ल ले पाने में ही है। इसके खिलाफ सांसदों का सबसे बड़ा, और कुछ हद तक न्यायसंगत ऐतराज यह होगा कि ऐसे किसी कानून के राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना बहुत ज्यादा है। हर राज्य की पुलिस संबंधित राज्य सरकार के नियंत्रण में काम करती है और सरकार के इशारे पर विपक्षी दलों के मजबूत प्रत्याशियों के खिलाफ किसी भी मामले में चार्जशीट दायर करके उन्हें चुनावी मैदान से बाहर कर देना पुलिस के लिए बाएं हाथ का खेल होगा।
बहरहाल, यह तो सिर्फ दलील देने की बात है। चार्जशीट वाली शर्त को अगर मौजूदा संसद पर ही लागू करके देखें तो कई नामी-गिरामी राजनेताओं समेत लगभग एक चौथाई सांसद अपने-अपने सदनों के बजाय सड़क पर खड़े नजर आएंगे। जाहिर है, इस विधेयक को मंजूरी देना उनके लिए आत्मघात करने जैसा ही होगा। सवाल यह है कि इस हकीकत को जानते हुए भी सरकार चुनाव सुधार के नाम पर ऐसा सपाट विधेयक लाने की तैयारी क्यों कर रही है? कहीं इसलिए तो नहीं कि सिविल सोसायटी ने सरकारी भ्रष्टाचार के बाद चुनाव सुधार को ही अपना अगला अजेंडा घोषित कर रखा है और सरकार इस सिलसिले में कोई सामाजिक विमर्श शुरू होने से पहले ही अपना दामन पाक दिखाने को उतावली हो रही है? बेहतर होगा कि सरकार इस मामले में धीरज दिखाए और राजनीति के अपराधीकरण को चुनाव सुधार की व्यापक चुनौती का ही एक हिस्सा मानकर चले।

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