Tuesday, September 6, 2011

जनतंत्र के बुनियादी सरोकार


भारत में प्रजातंत्र का रक्षक मानी जाने वाली संसद में ज्यादातर सांसद किसी न किसी राजनैतिक पार्टी के जरिए ही पहुंचते हैं। जब कभी जनतंत्र की हिफाजत की बात आती है, राजनैतिक पार्टियां बढ़-चढ़ कर अपने महत्व को उजागर करने में भी जुट जाती हैं। हाल में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान यही देखने में आया, बल्कि नजारा कुछ ऐसा हो गया कि संसद के भीतर और बाहर के बीच की तनातनी खिंचती चली गई।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक खुद को बताने वाली अलग-अलग पार्टियों के एमपी भी एक ही सुर में बोलते नजर आए। उनका कहना था कि अन्ना का आंदोलन जनतंत्र को कमजोर कर सकता है क्योंकि वह निर्वाचित प्रतिनिधियों के विरुद्ध माहौल बना रहा है। लेकिन कभी किसी ने यह भी सोचा कि जिन राजनैतिक पार्टियों के सहारे हमारा लोकतंत्र चल रहा है, उनके भीतर खुद कितना जनतंत्र बचा हुआ है? और तो और, यह देखना बड़ा हैरान कर देता है कि हमारे यहां किसी भी राजनैतिक दल का अपने वार्षिक चुनाव का कोई नियम नहीं चल रहा है।
यह सोचने की जरूरत भी नहीं महसूस की जाती कि पार्टियों का आंतरिक अनुशासन कैसा है? प्राय: इन पार्टियों में संचालन का काम कुछ बड़े लोग या फिर परिवार ही करते नजर आते हैं। किसी न किसी रूप में वहां भी पैसे का जोर चल निकला है। देखते-देखते पार्टियां भी अमीर हुई जा रही हैं। तमाम प्रमुख पार्टियों में यह नजर आने लगा है कि प्रभावशालियों की ही ताकत चल रही है। यदि किसी प्रभावशाली के चहेते को संयोग से टिकट न मिल पाए तो उसका मूड खराब हो जाता है और वह आपा खो बैठता है।
एक तरह से देखा जाए तो संसद पहुंचने का रास्ता अब परिवार ही बना रहे हैं। यही रंग राज्यों में भी देखा जा सकता है। जिस देश में लगभग 40 फीसदी जनता गरीबी रेखा के नीचे जीने को विवश हो, वहां की संसद में प्रतिनिधियों का वर्ग एकदम दूसरा ही नजर आता है। लगता ही नहीं कि वे उन गरीबों के प्रतिनिधि हैं। राजनैतिक दलों के भीतर ऐसे लोगों के वर्चस्व से नुकसान यह हुआ है कि जनतंत्र के बुनियादी सरोकार लगातार कमजोर पड़ते जा रहे हैं। हालत यहां तक आ पहुंची है कि आमतौर पर राजनैतिक पार्टी के मुखिया का चयन करते वक्त भी जनतांत्रिक प्रक्रिया का पालन पूरी तरह नहीं किया जाता। अगर हम भारतीय जनतंत्र की जड़ें मजबूत करना चाहते हैं तो यह जरूरी है कि पार्टी इलेक्शन के दौरान भी जनतांत्रिक मिजाज बना रहे। यह तभी संभव हो सकेगा जब पार्टी के वर्कर अपना नेता खुद चुनें। वह थोपा न जाए।

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