ज्यादा जिम्मेदार बनें
एनबीटी का मत
इस गुरुवार संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। सरकार ने तय किया था कि इस सत्र के 26 कामकाजी दिनों में 32 बिल संसद में लाए जाएंगे। पर लोकपाल, भ्रष्टाचार और महंगाई आदि मुद्दों को लेकर हुए हंगामे के कारण सरकार 12 बिल ही सदन में पेश कर सकी और उनमें से सिर्फ 10 पारित हो सके। देश के विकास और व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिहाज से संसद में कम कामकाज होना एक गंभीर बात है।
फूड सिक्योरिटी और मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम के संशोधन बिल समेत कई ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक हैं जिन पर इस सत्र में चर्चा होनी थी, पर वह नहीं हो सकी। इसके लिए सरकार और विपक्ष, दोनों की आलोचना की जा सकती है। अगर देश की संसद ही खुद तय कार्यक्रमों के अनुसार नहीं चलेगी, तो इससे एक गलत संदेश जाएगा। इसका असर देश की छवि पर भी पड़ता है। अचानक पैदा हुए किसी संकट का नोटिस लेना सही है पर उस मुद्दे को लेकर बहस में उलझ जाना और उसके लिए संसद का कामकाज ठप कर देना बिल्कुल उचित नहीं है। अब वह दौर गया जब किसी मसले पर लंबे आंदोलन और हड़तालें हुआ करती थीं। 90 के दशक में हुए उदारीकरण का सबसे अहम सबक यही है कि वक्त किसी भी कीमत पर बर्बाद न हो। अपनी पेशागत जरूरतों के कारण समय का महत्व समझ चुकी देश की नौजवान पीढ़ी संसदीय कामकाज में ऐसी लेटलतीफी देखकर हैरान है। जन हित के बिलों को लेकर संसद का यह रवैया काफी खतरनाक है।
दूसरा मत
यह अगंभीरता नहीं है
अनिल चमडि़या, राजनीतिक विश्लेषक
संसद सत्र का तयशुदा कार्यक्रमों के अनुसार नहीं चलना अगंभीरता का परिचायक नहीं है। पिछले चालीस वर्षों में नौ बार लोकपाल विधेयक पारित नहीं किया जा सका। मौजूदा संसद में महंगाई पर नौ बार बहस हो चुकी लेकिन सरकार महंगाई को रोकने में खुद को लाचार घोषित कर चुकी है। इसीलिए संसद की गंभीरता को सत्र के चलने व नहीं चलने की भाषा के दायरे में ही नहीं देखा जा सकता है। संसद का मंच केवल सरकारी बिलों को पारित करने के लिए नहीं होता है। सत्ता पक्ष की यह कोशिश होती है कि संसद उसके पक्ष के मंच के रूप में तब्दील हो जाए। यह संसद की गंभीरता पर चोट होती है।
एक आम संसद सदस्य की संसद के भीतर ताकत कमजोर हुई है। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी को जीरो ऑवर में 15 मिनट तक राष्ट्र को संबोधित करने का मौका मिला। संसद के इतिहास की यह पहली घटना थी। संसद के भीतर आम और खास का एक फर्क साफ -साफ दिखता है। संसद में जितने समय तक कामकाज होता है यदि उसका मूल्यांकन किया जाए तो संसद की गंभीरता का अंदाजा नहीं मिलता। संसद सदस्यों की उपस्थिति से लेकर बहस की भाषा और सरकार के दृष्टिकोण से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
राजनेता महज पब्लिक फेस के लिए चिंतित होते है। गंभीरता का अर्थ जनहित को लेकर राजनीतिक पार्टियों में सक्रियता है। संसद का सत्र प्रश्नकाल से शुरू होता है और उसे चलाए रखने पर पाटिर्यां सबसे ज्यादा गंभीर होने का भाव प्रदशिर्त करती हैं लेकिन पूछे जाने वाले प्रश्नों और इन पर सरकार के रुख का अध्ययन करें तो पाया जा सकता है कि आमतौर पर सरकार संसद के प्रति लापरवाह हुई है। फिलहाल संसद की जो चिंतनीय स्थिति दिख रही है उसकी वजह यह है कि संसद बहुदलीय प्रणाली से दो पाटीर् प्रणाली की तरफ बढ़ रही है।
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