अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर पहले भले ही कई आशंकाएं जताई जाती रही हों, लेकिन इसका सार्थक असर अब कई रूपों में नजर आने लगा है। प्राय: सभी राजनैतिक दल अपनी छवि सुधारने की मुहिम में जुट गए हैं।
मुख्य विपक्षी दल बीजेपी की बात करें तो उसने करीबन एक महीने के अंतराल में अपने दो मुख्यमंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदयुरप्पा को हटे कुछ ही हफ्ते हुए थे कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को भी बीजेपी हाईकमान ने चुटकियों में दफा कर दिया।
उनकी जगह दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए पूर्व मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी ने अपना पद संभालते ही जिस तरह के संकेत दिए हैं, उनमें भी अन्ना इफेक्ट खूब काम करता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री ने अपनी कैबिनेट सहित तमाम आईएएस और आइपीएस अधिकारियों से महीने भर के भीतर अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने को कहा है।
यह आश्वासन भी दिया है कि वह खुद अपनी संपत्ति का ब्यौरा निश्चित समयावधि में सार्वजनिक करेंगे। यही नहीं, खंडूरी ने दो महीने के अंदर ही राज्य में एक प्रभावी लोकायुक्त की नियुक्ति कराने का संकेत भी दे दिया है। वह बिहार की तर्ज पर बेनामी प्रॉपर्टी बिल लाने की बात भी कर रहे हैं ताकि भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की गलत तरीके से अर्जित संपत्ति को जब्त किया जा सके और उनमें कानून का डर पैदा किया जा सके।
जिस तरह खंडूरी अच्छे प्रशासन के लिए उत्साहित नजर आ रहे हैं, उससे ऐसा लग रहा है कि बीजेपी आलाकमान की नजर में पिछला प्रशासन जरूर कुछ कमजोर और पार्टी छवि को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा होगा। खुद बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पूर्व मुख्यमंत्री निशंक की इस बात के लिए प्रशंसा ही की है कि उन्होंने पार्टी का आदेश स्वीकार किया। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया है कि उन पर कोई आरोप नहीं है, बल्कि यह बदलाव आगामी चुनावों के मद्देनजर किया गया है।
लेकिन उसका यह रवैया आंख के सामने मौजूद चीज की अनदेखी करने जैसा है। बीजेपी के लिए अपनी छवि सुधारने का अर्थ अगर यही है कि गलत लोगों को तब तक अभयदान दिया जाए जब तक पानी नाक से ऊपर न जाने लगे, और इस क्रम में जब सत्ता हाथ से जाती दिखे तब उन्हें किनारे करके कोई साफ चेहरा आगे कर दिया जाए, तो देखना होगा कि ऐसा करके कहीं वह भारतीय मतदाताओं के राजनीतिक विवेक की अनदेखी तो नहीं कर रही है।
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