कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस शिवराज पाटिल काअपनी नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद अपना इस्तीफाराज्यपाल को सौंप देना कोई ऐसी घटना नहीं है , जिसेसिर्फ एक राज्य तक सीमित मानकर दरकिनार कर दियाजाए। कई कारणों से , खासकर राज्य के मुख्यमंत्री रहेबीजेपी के कद्दावर नेता बी . एस . येदयुरप्पा के इस्तीफेको लेकर कर्नाटक का लोकायुक्त पद पिछले कई महीनों सेचर्चा में है। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि कर्नाटकदेश का वह अकेला राज्य है , जहां इस पद पर आसीनव्यक्ति मुख्यमंत्री तक पर हाथ डालने की स्थिति में है।
जिस लोकपाल विधेयक को लेकर इधर देश में इतनीउम्मीद बांधी जा रही है , उसे भी कई मामलों में कर्नाटकके लोकायुक्त को ही अपना रोल मॉडल मानकर चलनापड़ सकता है। जस्टिस शिवराज पाटिल का इस्तीफालोकपाल की धारणा से जुड़ी व्यावहारिक जटिलताओं की ओर संकेत करता है , लिहाजा इससे जुड़े ब्यौरों को कुछज्यादा ही गौर से देखा जाना चाहिए। आगामी 22 सितंबर को लोकायुक्त की विशेष अदालत में येदयुरप्पा परचल रहे भ्रष्टाचार के दो मुकदमों में से एक की सुनवाई होने वाली थी और बीते 15 सितंबर को उन्होंने इसमेंअपनी संभावित गिरफ्तारी के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत हासिल कर ली थी।
जस्टिस पाटिल के इस्तीफे से इस सुनवाई पर कोई असर पड़े या न पड़े , लेकिन येदयुरप्पा के लिए यह कुछ नकुछ राहत का विषय जरूर होगा। इतना तय है कि यह इस्तीफा सीधे तौर पर किसी भ्रष्टाचार में फंसने की वजहसे नहीं , बल्कि एक लोकापवाद को आधार बनाते हुए दिया गया है , लिहाजा लोकायुक्त पद की गरिमा को इससेकोई ठेस नहीं लगी है। जस्टिस पाटिल पर आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक बिल्डिंग सोसायटीज एक्ट नियमावलीकी एक उपधारा का उल्लंघन करके बेंगलूरु में पहले से अपने दो प्लॉट होते हुए एक सोसायटी से तीसरा प्लॉटभी खरीद लिया था। अपनी सफाई में जस्टिस पाटिल का कहना था कि यह प्लॉट उनकी पत्नी ने नीलामी मेंखरीदा था , वह भी तब , जब संबंधित सोसायटी के दिवालिया हो जाने की स्थिति में राज्य सरकार ने उसेनियमावली के बंधन से मुक्त कर दिया था।
यह कोई कानूनी मामला नहीं है , न ही पद के दुरुपयोग जैसी कोई बात इसमें शामिल है , क्योंकि प्लॉट खरीदेजाने के समय जस्टिस पाटिल किसी सरकारी या न्यायिक पद पर आसीन नहीं थे। इसके बावजूद उनकोलोकायुक्त के पद से हटानेे के लिए यह आरोप पर्याप्त सिद्ध हुआ , क्योंकि इस पद पर आसीन व्यक्ति का चरित्रजिस शीशे जैसा होने की अपेक्षा की जाती है , उसमें कम से कम एक बाल तो इससे आ ही गया। सवाल यह है किजब देश में लोकपाल का कानून आ जाएगा और इससे जुड़ी संस्थाएं मुख्यमंत्रियों से लेकर स्वयं प्रधानमंत्री तकपर नजर रखने लगेंगी , तब इन पर आसीन होने के लिए ऐसे लोग कहां से लाए जाएंगे , जिन पर कहीं से कोईआरोप लगाया ही न जा सके ? ऐसे कुछ लोग मिल भी गए तो सत्ताधारियों की ताकत के सामने उन्हें लगातारआरोपमुक्त कैसे रखा जाएगा ? और आरोप लगने के बाद भी वे अगर अपने पद पर डटे रहे तो सरकारी लोगोंऔर उनमें फर्क क्या रह जाएगा ?
जिस लोकपाल विधेयक को लेकर इधर देश में इतनीउम्मीद बांधी जा रही है , उसे भी कई मामलों में कर्नाटकके लोकायुक्त को ही अपना रोल मॉडल मानकर चलनापड़ सकता है। जस्टिस शिवराज पाटिल का इस्तीफालोकपाल की धारणा से जुड़ी व्यावहारिक जटिलताओं की ओर संकेत करता है , लिहाजा इससे जुड़े ब्यौरों को कुछज्यादा ही गौर से देखा जाना चाहिए। आगामी 22 सितंबर को लोकायुक्त की विशेष अदालत में येदयुरप्पा परचल रहे भ्रष्टाचार के दो मुकदमों में से एक की सुनवाई होने वाली थी और बीते 15 सितंबर को उन्होंने इसमेंअपनी संभावित गिरफ्तारी के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत हासिल कर ली थी।
जस्टिस पाटिल के इस्तीफे से इस सुनवाई पर कोई असर पड़े या न पड़े , लेकिन येदयुरप्पा के लिए यह कुछ नकुछ राहत का विषय जरूर होगा। इतना तय है कि यह इस्तीफा सीधे तौर पर किसी भ्रष्टाचार में फंसने की वजहसे नहीं , बल्कि एक लोकापवाद को आधार बनाते हुए दिया गया है , लिहाजा लोकायुक्त पद की गरिमा को इससेकोई ठेस नहीं लगी है। जस्टिस पाटिल पर आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक बिल्डिंग सोसायटीज एक्ट नियमावलीकी एक उपधारा का उल्लंघन करके बेंगलूरु में पहले से अपने दो प्लॉट होते हुए एक सोसायटी से तीसरा प्लॉटभी खरीद लिया था। अपनी सफाई में जस्टिस पाटिल का कहना था कि यह प्लॉट उनकी पत्नी ने नीलामी मेंखरीदा था , वह भी तब , जब संबंधित सोसायटी के दिवालिया हो जाने की स्थिति में राज्य सरकार ने उसेनियमावली के बंधन से मुक्त कर दिया था।
यह कोई कानूनी मामला नहीं है , न ही पद के दुरुपयोग जैसी कोई बात इसमें शामिल है , क्योंकि प्लॉट खरीदेजाने के समय जस्टिस पाटिल किसी सरकारी या न्यायिक पद पर आसीन नहीं थे। इसके बावजूद उनकोलोकायुक्त के पद से हटानेे के लिए यह आरोप पर्याप्त सिद्ध हुआ , क्योंकि इस पद पर आसीन व्यक्ति का चरित्रजिस शीशे जैसा होने की अपेक्षा की जाती है , उसमें कम से कम एक बाल तो इससे आ ही गया। सवाल यह है किजब देश में लोकपाल का कानून आ जाएगा और इससे जुड़ी संस्थाएं मुख्यमंत्रियों से लेकर स्वयं प्रधानमंत्री तकपर नजर रखने लगेंगी , तब इन पर आसीन होने के लिए ऐसे लोग कहां से लाए जाएंगे , जिन पर कहीं से कोईआरोप लगाया ही न जा सके ? ऐसे कुछ लोग मिल भी गए तो सत्ताधारियों की ताकत के सामने उन्हें लगातारआरोपमुक्त कैसे रखा जाएगा ? और आरोप लगने के बाद भी वे अगर अपने पद पर डटे रहे तो सरकारी लोगोंऔर उनमें फर्क क्या रह जाएगा ?
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