Friday, September 9, 2011

9/11 के बाद से कितना बदला अमेरिका


सी. उदय भास्कर
अगले रविवार को 11 सितंबर 2011 को अमेरिका में हुई दुखद घटनाओं की दसवीं बरसी है। यह देखना भारत के लिए भी उपयोगी होगा कि इस एक दशक ने एक राष्ट्र के रूप में और संसार में लोकतंत्र के सबसे पुराने और सबसे ऊर्जस्वी प्रतीक के रूप में अमेरिका पर कैसा असर डाला है। इस असर को ज्यादा अच्छी तरह समझने के लिए पिछले 20 वर्षों में अमेरिका की बदली हैसियत और चाल-ढाल पर नजर डालना श्रेयस्कर होगा।
शीतयुद्ध की जीत
1991 के अंत में बिल्कुल अप्रत्याशित ढंग से शीतयुद्ध की समाप्ति हुई और अमेरिका ने सोवियत संघ के खिलाफ सीधे एक भी गोली चलाए बगैर इसे जीत लिया। यह बात जगजाहिर थी कि अफगान युद्ध के दौरान बिन लादेन किस्म के व्यक्तियों और अलकायदा किस्म की विचारधारा की मदद से अमल में लाई गई घेरेबंदी की रणनीति ने पूर्व सोवियत संघ के नाटकीय विघटन को आकार दिया था।लेकिन यह जीत एक कीमत चुकाकर हासिल की गई थी। 9/11 की शोकांतिका के बीज लंबे खिंचे अफगान युद्ध के दौरान ही बोए जा रहे थे। एक हाथ में कलाशनिकोव और दूसरे में कुरान पकड़े जिन मुजाहिदीनों की मदद से अमेरिका ने दिसंबर 1991 में शीतयुद्ध को उसके अंजाम तक पहुंचाया था, वे ही इसके बाद के सालों में लौट कर खुद उसी पर हमला करने चले आए।
पर्ल हार्बर की याद
1991 के अंतिम दौर में अमेरिका की हैसियत दुनिया के दारोगा या एकमात्र सुपरपावर की थी। जनवरी 1991 में कुवैत को लेकर इराक के खिलाफ हुई जंग में चमत्कारिक जीत ने अमेरिकी सेना के उत्साह और आत्मविश्वास को चरम पर पहुंचा दिया। तब तक अमेरिका वियतनाम की छाया से मुक्त हो चुका था। क्लिंटन के कार्यकाल के पहले दौर में अमेरिका को लगता था कि वह विश्व को अपने मुताबिक चला लेगा, लेकिन 1991 के अंत और 2001 का फर्क वाकई विस्मयकारी है। सितंबर 2001 में ट्विन टावर्स पर हुए हमले से पैदा हालात की तुलना 1941 में पर्ल हार्बर में लगे झटके से की जा सकती है।
9/11 की घटना के 10 साल बाद अमेरिका की एक उपलब्धि की तो सराहना करनी ही होगी। वाइट हाउस और अमेरिकी प्रशासन के विभिन्न अंग अपने इस मूलभूत लक्ष्य को पाने में सफल रहे कि अमेरिका पर फिर कोई आतंकी हमला न हो। इसके लिए पूरे सिस्टम का पुनर्मूल्यांकन किया गया और सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर व विभिन्न संस्थाओं के कामकाज को नए सिरे से व्यवस्थित किया गया। नवंबर 2002 में गठित 9/11 कमिशन ने एफबीआई और सीआईए के कामकाज की व्यापक समीक्षा की और इस बात पर भी गौर किया कि इनसे आखिर कहां चूक हुई। दो वर्षों की गहन छानबीन और विचार-विमर्श के बाद कमिशन ने अमेरिका की भावी सुरक्षा का एक रोडमैप तैयार किया। बाहरी मोर्चे पर बुश प्रशासन ने तालिबान और अफगानिस्तान के खिलाफ कार्रवाई पर फोकस किया और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति भी प्राप्त की।
भारत के नजरिए से देखें तो तालिबान के खिलाफ अमेरिका की त्वरित और आक्रामक कार्रवाई और काबुल में सत्ता परिवर्तन हमारे लिए लाभदायक रहा। हालांकि तब कौन सोच सकता था कि दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर आतंकवादी हमला हो सकता है। इसके बाद जो हुआ उसे एक बड़ा अमेरिकी ब्लंडर ही कहा जा सकता है- आतंक के विरुद्ध युद्ध में 2003 में अफगानिस्तान से इराक की ओर शिफ्ट। राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर तीन गंभीर अपराधों के आरोप लगाए गए थे। डब्ल्यूएमडी पाने का प्रयास, न्यूक्लियर वैपन, आतंकवाद का समर्थन, धार्मिक कट्टरतावाद और ऐसा निरंकुश शासन चलाना जो अपने ही लोगों को दबा भी रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र को खुद इसके प्रमाण दिए थे जिन्हें यूएस सेक्रेटरी जनरल कोलिन पावेल ने जुटाया था। हालांकि बाद में उन्होंने माना कि ये न सिर्फ कम प्रामाणिक आधारों पर तैयार किए गए थे, बल्कि कुछ तो निराधार थे।
विरोधाभासी ढंग से अमेरिका ने गलत देश का चुनाव कर लिया। इराक से कहीं ज्यादा इस तरह का देश पाकिस्तान था, जो आतंकी संगठनों और धार्मिक कट्टरता को खतरनाक तरीके से मदद कर रहा था। इस प्रक्रिया में अमेरिका ने अपनी विश्वसनीयता तो खोई ही, उसके बाद संदिग्ध आतंकियों के प्रति क्रूर रवैये ने उसकी साख और गिराई। इराक युद्ध तो एक तरह से अमेरिकी पकड़ से बाहर ही निकलता नजर आ रहा था। इससे भी खराब यह हो रहा था कि वाइट हाउस के रवैये के कारण इराक की शिया बहुल जनता ईरान के करीब हो रही थी। इराक की वस्तुस्थिति को समझने के लिए लगाए गए गलत अनुमान ही नहीं, बुश प्रशासन की नीतियां भी इराक में पैदा हुई स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं।
वर्ष 2009 की शुरुआत में वाइट हाउस में बुश-ओबामा के बीच सत्ता परिवर्तन के दौर में अमेरिका ने आतंक के खिलाफ जंग की भारी कीमत चुकाई। वैसे तो इस साल मई में ओसामा बिन लादेन का नाटकीय अंत उसके लिए एक बड़ी जीत मानी जा सकती है पर यह विजय उसे काफी महंगी पड़ी है। अक्टूबर 2001 में शुरू की गई इस जंग में हाल तक 6099 अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। अगर इसमें इराकियों, अफगानियों और पाकिस्तानियों की मौत के आंकड़े को भी शामिल किया जाए, तो यह संख्या 2 लाख 25 हजार से 2 लाख 58 हजार के बीच ठहरती है। आर्थिक नजरिए से देखें तो इसमें अमेरिका के करीब 4 खरब डॉलर खर्च हुए हैं।
कर्ज में ऊभ-चूभ
यह अकेला नुकसान नहीं है। इस साल के मध्य में अमेरिका की आर्थिक शक्ति भी डगमगा गई। क्रेडिट रेटिंग में की गई कटौती ने उसकी आर्थिक साख को काफी क्षति पहुंचाई है। 3 अगस्त 2011 को अमेरिका पर कुछ 14.7 खरब डॉलर का कर्ज था। इसे यदि उसके जीडीपी (जून, 2011 को यह 15.003 खरब डॉलर थी) के बरक्स देखें, तो यह उसका 98 प्रतिशत ठहरता है। संक्षेप में कहें तो अमेरिका अब महसूस करने लगा है कि अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं और आतंकवाद के खिलाफ अपनी जंग की वह कितनी बड़ी कीमत चुका रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इनकी वजह से इन दस वर्षों में उसने क्या पाया और क्या खोया है।

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